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मधुशाला और हम

Megha Agarwal
Megha Agarwal
6th May, 2020

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घरों में कैद रह कर खुद को बचाया इक बीमारी से सबने
आजाद हुए जब तो दुसरी मुसीबत से घिरा पाया खुदको हमने,
नशा ए लत लगी कभी जिस महखाने की हमें,
जान की खातिर उससे भी दूरी बनाली हम सबने,
हुआ था यह चमत्कार जो सालो तक कोई ना कर पाया,
छूट गई मधुशाला की लत उसकी भी जो उसको छोड़ न पाया,
पीछा इससे छुड़ाकर अपनो संग खुश रहने लगे जब हम,
तभी महखाने खुलने की खबर ने पलट दिया सब कुछ,
जिस आदत को छोड़ा कभी जिंदगी की खातिर,
आज उसी के पीछे भाग रहे सब लाइन लगा कर,
पता चला अब हमें जरूरी जिंदगी में क्या है हमारे,
खाना खाने को मिले न मिले पर गला गीला करने के लिए होना चाहिए कुछ,
सांस जब तक रहेंगी इस शरीर में पीना हम छोड़ेंगे नहीं,
भूल जाए इबादत और राशन लाना पर मेहखाना जाना भूलेंगे नहीं,
गरीब है हम दो वक़्त की रोटी भी चैन से हमें नसीब नहीं
रियायत की खातिर जीवन भर रोना इसका रोते हैं,
पर मदिरा चाहे कितनी ही महंगी क्यूं ना हो,
बिक जाए भले सब कुछ पर पीना हम छोड़ेंगे नहीं,
जंग जीत जाएंगे इक बीमारी से इसमें कोई शक नहीं,
पर मह के लालच में जीता हुआ भी सब हार जाएंगे,
यह सच भी किसी से छुपा नहीं,
अब भी वक़्त है संभल जाओ जरूरत को अपनी बदलो तुम,
पीने से ज्यादा जिंदगी जीने के सुनहरे अवसर को थामो तुम

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