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ये मन....

Bhawna Nagaria
Bhawna Nagaria
24th Jul, 2020

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चंचल मन को मैं समझाता ,
थपकी देकर इसे सुलाता ,
पर.... मुझसे पहले ये उठ जाता ,
कहां....इसे मैं , काबू कर पाता ।

कभी ये मन शिल्पी ...बन जाता ,
अलग अपना ...एक संसार बनाता,
कटी पतंग सा ... ये मन बन जाता,
बन पंछी ... फिर अंबर उड़ जाता ।

कभी ये मन... गुलाब सा खिल जाता ,
जीवन की सूनी .... बगिया महकाता ,
बेवजह होंठों की , मुस्कान बढ़ाता ,
साज बिना .... संगीत सुनाता ।

कभी बिन बारिश ...ये मन भीग जाता ,
गमों का समंदर , आंखों से बह जाता ,
बिना तपन ये , कभी झुलस जाता ,
मन ये फिर ... मरुस्थल बन जाता ,
शीतल इसे ... फिर कोई ना कर पाता ।

कभी टूटकर... ये मन बिखर जाता ,
लाख जतन कर... पर ये सिमट ना पाता ,
कभी उलझता.....कभी सुलझता ,
मन का करने ... ये साजिश भी रचता,
पर मन .... हरदम मनमानी करता ।

पल-पल , हर-पल.... रंग बदलता ,
कभी ना थकता , कभी ना रूकता ,
दिल -दिमाग की सुन.... ये थोड़ा सिमट जाता,
उम्र के चढ़ाव पर ... ये थोड़ा सहम जाता ,
कभी लुटा सा, कभी पिटा सा ,
कुछ थमता मन....पर फिर से मचल मचल जाता ।

शायद....हरदम चलते जाना ...मन की रीत है ,
मन की मन से ही ... गहरी प्रीत है ,
हर जन का ...ये मन ही मीत है ,
इस मन की जीत ही...सच्ची जीत है ।




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