Bluepadऑनलाइन शिक्षा : चुनौतियाँ बाकी है...
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ऑनलाइन शिक्षा : चुनौतियाँ बाकी है...

Shreyansh Jain
Shreyansh Jain
23rd Jul, 2020

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कुछ दिन पहले हम सब ने देखा कि किस तरह बेहाल मजदूर काम बंद होने से अपने अपने घरों को लौट रहे थे। किसी को पता नहीं था कि यह महामारी इतने लंबे अड़से तक रहेगी। हर किसी को यही लगा था कि खाना पीना ना मिलने से अच्छा है कि वहाँ से निकले और अपने गाँव जाकर मरे। लेकिन अब हालत उससे बदतर हो गए हैं। क्यूंकी जब यहाँ से लोग चले गए तब बच्चों के स्कूल की परीक्षाएँ या तो खतम हुई थी या शुरू होने वाली थी। जिनकी शुरू होने वाली थी ऐसे कुछ स्कूलों ने परीक्षा न लेने का निर्णय लिया और बच्चों की परीक्षा का टेंशन निकल गया था। लेकिन अब स्कूल शुरू हो गए है और वो भी ऑनलाइन। जो बच्चे अपने स्कूल से दूर अपने गाँव में रहते है उनके पास अगर स्मार्ट फोन या कम्प्युटर नहीं हो तो वो उन्हे यह ऑनलाइन शिक्षा नहीं मिल रही है। स्कूल के पास रहने वाले बच्चों के लिए भी चुनौतियाँ बाकी हैं।



इसके पहले कि इस विषय पर हम आगे बढ़ें, हमें यह मान लेना चाहिए कि ऑनलाइन शिक्षा यह स्कूली शिक्षा का विकल्प नहीं है बल्कि यह एक उपाय है। सरकार ने बच्चों की पढ़ाई कहीं रुक ना जाए इसलिए यह कदम उठाया है। लेकिन क्या वाकई बच्चों की पढ़ाई हो रही है? इस सवाल का जवाब हाँ और ना दोनों हो सकता है। क्यूंकी शिक्षक इस नयी शिक्षा प्रणाली को स्वीकार कर एक समय पर ७० – ८० छात्रों को पढ़ा रहे हैं, उनसे सवाल जवाब कर रहे हैं यहाँ तक कि उन्हे होम वर्क भी दे रहे हैं। इसका मतलब ऊपर ऊपर से तो सब ठीक दिख रहा है। लेकिन क्लास में जिस तरह शिक्षक हर छात्र की आँखों में देख कर पता लगाते थे कि उसे विषय समझा है या नहीं, यह नहीं हो रहा। बच्चे क्या लिख रहे है वो शिक्षक को नहीं दिखता। और बच्चे का ध्यान अगर किसी दूसरी जगह पर है तो वो शिक्षक को पता नहीं होता।

इसमें शिक्षक भी बहुत मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। एक बात यह है कि शिक्षकों का प्रशिक्षण ऑनलाइन शिक्षा के लिए हुआ नहीं था। मतलब उनका जो प्रशिक्षण हुआ है वही पाठ्यक्रम उन्हे नई प्रणाली में देना पड़ रहा है। इसमे टेक्नोसॅवी न होने वाले या जिनके घर में भी ऐसा कोई व्यक्ती ना होने वाले शिक्षकों के लिए तो यह बहुत दिक्कत भरा हो रहा है। उनके टेक्नोसॅवी न होने के जिम्मेदार भी सरकार है। सरकार ने हमेशा चुनाव और जनगणना जैसे कामों में शिक्षकों को झोंक दिया है। इसके बजाय उन्हे टेक्नालॉजी का ज्ञान दिया जाता तो शायद आज यह नौबत नहीं आती।

ऑनलाइन शिक्षा शुरू करने से पहले छात्रों के पास सारी सुविधा है या नहीं इसका जायजा लिया नहीं गया। कई सारे अभिभावकों के पास जो स्मार्ट फोन होते है उसमे २ GB डेटा चलता है। जिओ जैसे फोन में २१ या १०० रुपये में ज्यादा का डेटा खरीदा जा सकता है। पहले ही स्कूल ऑनलाइन शिक्षा की फी भी रेग्युलर स्कूल जैसी ले रही है ऐसे में जिनके काम धंधे कारोबार बंद पड़े हैं वो बच्चों के लिए यह ज्यादा का डेटा कब तक खरीद सकेंगे? उसमें अगर घर में २ से ज्यादा बच्चे हो तो वो बच्चे एक ही समय पर अपनी अपनी कक्षा कैसे अटेण्ड कर सकते हैं? कई गांवो में मोबाइल के टॉवर नहीं है ना वायफाय की सुविधा, वहाँ तक शिक्षा कैसे पहुंचाई जा सकती है? ऐसे छात्रों के लिए क्या योजना बनाई गई थी?

प्राथमिक स्तर पर दिख रहा है कि स्कूलों के सामने भी कई अड़चने हैं। शिक्षा संस्थाएं अब भी ग्रंथालय कैंटीन, वाहन व्यवस्था के पैसे फीस में लगा रही हैं। उनका कहना है कि सब कुछ बंद होने के बावजूद उन सभी कर्मचारियों को उन्हे पगार देना जरूरी है, तो वो यह पैसे कहाँ से लाएँगे? लेकिन जो अभिभावक अपने बच्चे की फीस नहीं भर पा रहे हैं ऐसे बच्चों को शिक्षा से बेदखल कर दिया जा रहा है? इतने वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र का जो बाजार चल रहा है उसका अब यह राक्षस बन गया है।

बस अब हम यही चाहते हैं की इस महामारी के संकट में जो उपाय सरकार ने किया है उससे और कोई बड़ी समस्या ना निर्माण हो। शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोग करने के लिए सरकार के पास एक अच्छा मौका था। कई सारी शिक्षा संस्थाएं बच्चों में कुशलता विकसित कर उन्हे शिक्षा दे रही हैं। उनके साथ मिलकर शिक्षा की नई प्रणाली की खोज की जा सकती थी जो कोरोना संकट के बाद भी चलाई जा सकती थी। हमारे शिक्षा प्रणाली के बारे में कई लोग नाराज है ऐसे में कुछ और समय लेकर सिर्फ शिक्षा विभाग में काम करने वाले ही नहीं बल्कि शिक्षा के लिए काम करने वाले लोग और संस्थाओं के साथ मिलकर पाठ्यक्रम का नियोजन होता तो हर बच्चे को एक अभ्यास दिया जा सकता था। यह अभ्यास अब स्कूल के पास ना रहने वाले बच्चों के लिए भी कारगर साबित होता और वो शिक्षा से वंचित नहीं रहते। शिक्षा जीवन को आसान करने और ज्ञान के दरवाजे खोलने वाला माध्यम है, और वो सिर्फ किताबों में नहीं मिलता, बस इतनी सी बात अगर शिक्षाविदों को समझ आती तो भी काफी था।

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