Bluepadअच्छे नेता की जरूरत है...
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अच्छे नेता की जरूरत है...

Simran
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30th Nov, 2021

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नेल्सन मंडेलाजी ने कहा था, नेता चरवाहे जैसा हो, वो जनता का नेतृत्व उनके पीछे से करे। इसका मतलब यह है कि आप लोगों का नेतृत्व और उन्हे मार्गदर्शन तो करें लेकिन उनके हक, उनकी राय, सवाल और उनकी उन्नति यह अग्रक्रम पर होने चाहिए। तभी वो आपपर विश्वास कर सकेंगे। नेल्सन मंडेला पर महात्मा गांधी का प्रभाव था। गांधीजी ने खुद कहा था कि, “एक अच्छा नेता वो होता है जिसके अनुयाई तो होते हैं उसके साथ वो नेता भी निर्माण करता है।“ गांधीजी को आदर्श मानकर मंडेला नेता बने लेकिन उनके जैसा नेता भारत में नहीं हुआ। जो भी हुए वो सब गांधीजी के ही गुणगान गाने वाले थे और है। अब तो गांधीजी के बारे में अत्यंतिक श्रद्धाभाव और द्वेष दोनों दिखते हैं। वास्तव में यह नसीब भारत के सभी नेताओं के हिस्से आया है।


डॉ. बाबासाहब आंबेडकर यह महाराष्ट्र के भूमि में जन्मा एक ऐसा नगीना थे जिनकी लोकप्रियता पूरे विश्व में गूँजती है। बदतर मुश्किल हालातों से उभर कर अपने लोगों के हिस्से में वो दुख, दर्द और गरीबी ना आए इसलिए वो दिन रात एक कर के पढे। जात पात रहित देश की रचना करने में बहुत मौलिक योगदान दिया। हम जब नेतृत्व के बारे में बात कर रहे हो तो डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के बारे में बात अपने आप छिड़ जाती है। अपना अस्तित्व ही खो चुके ६ करोड़ लोगों को दिशा दिखाने वाला यह नेता, आज भी इस समाज में जहां जात पात का आडंबर हम देखते है, तो ७० साल पहले के उस सनातन समाज में अपना सिक्का जमाने वाला यह नेता कितना दृढ़ निश्चयी और ज्वलंत विचारों से सराबोर होगा इसकी हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं। उनके निधन के बाद बहुत नेता हुए, आंदोलन बने लेकिन कुछ अल्पजीवी हुए तो कुछ घर के भेद के श्राप से खतम हो गए।

बाबासाहब जिस राह पर चल रहे थे वो अनोखी थी लेकिन नई नहीं थी। उनके पहले महात्मा ज्योतिबा फुले, संत तुकाराम, संत कबीर, संत रविदास यहाँ तक की शिवाजी महाराज ने और उनके बाद शहू महाराज ने जात पात का निर्मूलन करने के उद्देश्य से कई कार्य किए लेकिन समाज में कुछ खास परिवर्तन नहीं आया। शिर्डी के साईबाबा तक हिन्दू मुस्लिम एकता बनाए रखने में असफल रहे। ऐसे जात पात के कीचड़ भरे माहोल में बाबासाहब अकेले लड़ रहे थे। वो स्वतंत्र्य, समता और बंधुता की सीख देने वाले बौद्ध धम्म की ओर चल पड़े तब भी उन्होने, “नेता कभी लोगों को अनुनय करने के लिए नहीं कहता, बल्कि अपने साथ सहप्रवासी करता है,” इस बात पर अमल किया।

बाबासाहब के बाद उनके आंदोलन की दिशा भटक सी गई। “जिसके पास धैर्य नहीं होता वो नेता नहीं बन सकता,” यह उन्ही के शब्द सच हो गए। ना तो गांधीजी के अनुयाई और ना ही बाबासाहब के अनुयाई भारत से जात पात को खदेड़ सके। आज भी यह बदल सकता है लेकिन इसकी जड़े बहुत गहरी चली गई है। कई सारे गट, संस्था, पार्टियां, विचारपीठ, विद्यापीठ बने, कई कार्यकर्ते होने के बावजूद मात्र कुछ स्वार्थी और बिनकाम के नेताओं की वजह से जनता आया दिन निकाल रही है। वो शिक्षा से अपने आप को प्रगल्भ बना रही है। लेकिन नेता खुद तो कोई काम करते नहीं लेकिन टीवी चैनलों पर एक दूसरे पर कीचड़ जरूर उछालते दिखते हैं।

जिस संविधान की प्रशंसा पूरे विश्व ने की है वो संविधान अपने देश में बहुत बढ़िया प्रगति ला सकता है यह विश्वास ही समाज के कुछ सिरफिरो ने डांवाडोल कर दिया है। बाबासाहब के पुतले का अनादर और उनके घर में तोडफोड की घटनाएँ यह बात साबित करती हैं। लेकिन ताली एक हात से बजती नहीं। बाबासाहब के अनुयाई अपने आंदोलन मजबूती से बनाएँ रखने में असफ़ल रहे हैं। १९७२ में दलित पैंथर जैसा कोई भी आंदोलन गाँवगाँव में पहुंचा नहीं। कुछ कॉंग्रेस और भाजपा वालों को तो वहाँ होने वाले अत्याचारों का पता भी नहीं होता। कभी ऑनर किलिंग की घटना हुई तो जात पात का नाश की बाते होती है। लेकिन जहां यह घटनाएँ होती है वो भी तो वहाँ के दबंगों के कारण होती है। अब तो उनको कानून का भी डर नहीं रहा। किसी का भी अनादर करो, मारपिट करो, उसका वीडियो बनाओ और उसे वायरल करो, यह अब आम बात हो गई है। “मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” यह मगरूरी ही इसमे दिखती है।

आज पूरे देश में लॉकडाउन होने के बाद कई उत्तर भारतीय लोग मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे शहरों से अपने अपने गाँव जाते हुए हम सब ने देखा। क्यूँ आए थे वो अपने घर से इतने दूर? क्या उनके गाँव में उपजीविका का कोई साधन नहीं था? ऐसे सवाल तो कोरोना काल के पहले भी हमारे दिल में आते थे। इसके जवाब के लिए आपको न्यूज चैनल पर मानरेगा का काम देखना पड़ेगा। कभी कभार यह अच्छा काम भी कर लेते हैं। वहाँ अनुसूचित जाती जनजाति के लिए उपजीविका होना या न होना एक ही बात है। ऐसे लोग जीने के लिए शहरों की तरफ नहीं आएंगे तो कहाँ जाएंगे? आज वो फिरसे उसी जाती के अखाड़े में वापस लौटे है। कुछ अभी वापस आ रहे हैं क्यूंकी सरकार ने आश्वासन देने के बाद भी उनके पास काम का कोई उपाय नहीं है ना रोटी का! देश में हर कदम पर एक नेता पनपता है, तब यह हालत क्यूँ है? अब देशवासियों ने उनके नेतृत्व की नहीं बल्कि अपने हकों के लिए संविधान के मुताबिक चलना चाहिए, तब ही प्रगति हो सकती है।

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