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बनावटी रिश्ते

Bhawna Nagaria
Bhawna Nagaria
14th Jul, 2020

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बदलते वक़्त के साथ , रिश्तों को बदलते देखा है ,
होंठों पर फीकी मुस्कान , और दिलों में बैर पनपते देखा है ।

प्यार और विश्वास ,अब रिश्तों में कहां मिलते हैं ,
रिश्ते -नाते निभाना ,आज गुजरे जमाने के किस्से लगते हैं।

रिश्तों की गहराई , स्वार्थ और मतलब के मुताबिक होती है ,
हर रिश्ते की सच्चाई , इसलिए आज शक के घेरे मे होती है।

रिश्तों मे वफादारी,अब बेमानी लगती है ,
इस फरेबी दुनिया मे, परिवार आज पुरानी चीज़ लगती है।

रिश्तों के चटकीले रंग, अब फीके पड़ने लगे हैं,
रिश्तों के ये बंधन ,ना जाने क्यूं ... चुभने लगे हैं ।

आज हर रिश्ता ...बिखर रहा है ,
अपना... अपने लिए ,अपनो का भी शोषण कर रहा है।
आज हर जन...अपनो से ही छला जा रहा है ,
शायद... इसलिए ही , रिश्तों मे फासला बढ़ता जा रहा है ।

जिंदगी जीने का , ये कैसा फलसफा है ,
यहां हर इक को , अपनी झूठी शान का नशा है ।
रिश्तों को निभाने की,ना किसी को आज दरकार है,
इन बनावटी रिश्तों मे..अपनेपन की ना वो पुरानी मिठास है

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