Bluepadविकास दुबे का जीवन, समय और विवादास्पद मौत !
Bluepad

विकास दुबे का जीवन, समय और विवादास्पद मौत !

Saurabh Zemse
Saurabh Zemse
14th Jul, 2020

Share

बहुत पहले ही विकास दुबे के अंदर घर कर गया था अपराध -
एक गांव में पंचायत लगी हुई थी । लोग इकट्ठा हो चुके थे । लोगों के सामने एक व्यक्ति अपने बगल मे बंदूक लिए बैठा था । ये इस गांव का प्रधान था जिसे पंचायत में पक्षों की दलीलें सुन कर उन पर फैसला सुनना था । पंचायत चल ही रही थी कि इतने में पेड़ पर बैठे एक पक्षी ने बीठ कर दी जो सीधा प्रधान के कंधे पर आ कर गिरी । प्रधान ने ऊपर देखा, अपनी बंदूक उठाई और पेड़ पर बैठे हर पक्षी पर निशान साधते हुए उन्हें मार गिराया ।

क्या एक पक्षी के लिए कोई आम इंसान इतनी क्रूरता दिखा सकता है ? शायद नहीं, बशर्ते उसका नाम विकास दुबे ना हो । जी हां वो गांव था बिकरु और वो प्रधान था वही विकास दुबे जिसे कुछ दिनों पहले पुलिस ने ढेर कर दिया । अपने आपको विकास पंडित कहलावाने वाले इस विकास दुबे ने भले ही अपराध जगत में बाद में कदम रखा हो लेकिन इसके अंदर अपराध बहुत पहले घर कर के बैठ गया था ।


1996 में दुबे ने नगर पंचायत चुनाव जीता और प्रधान बन गया । ये चुनाव झूठे वादे या नेक काम कर के नहीं जीता था दुबे ने । बल्कि अपने बंदूक के ज़ोर पर लोगों से वोट डालवाये थे ।
इसके बाद साल आया 1999 । इसी साल पर्दे पर रिलीज़ हुई सनी देओल और जुही चावला की फिल्म अर्जुन पंडित । वैसे तो लाखों दर्शकों के लिए ये केवल फिल्म ही थी लेकिन विकास के लिए ये फिल्म से बढ़ कर एक मार्गदर्शन साबित हुई । कहते हैं विकास ने इस फिल्म को 150 से ज़्यादा बार देखा और हर बार अर्जुन पंडित की तर्ज खुद को विकास पंडित बनाने का सपना देखा । अब तक दुबे पर अपहरण, अवैध कब्जे, धमकाने आदि जैसे कई केस लद चुके थे । लेकिन इन छोटे मोटे केसों के कारण उसे कोई बड़ा डॉन कैसे मनता भाला ।

फिर आया साल 2001, इस साल दुबे ने आधिकारिक रूप से अपराध जगत में कदम रखा । जिसके लिए उसे हत्या जैसा जघन्य अपराध करना पड़ा । हत्या भी किसी आम इंसान की नहीं बल्कि उस समय की राजनाथ सिंह सरकार के मंत्रीमंडल में शामिल संतोष शुक्ला की । कानून और पुलिस के खौफ से निडर होते जा रहे विकास दुबे ने शिवली थाने में घुस कर मंत्री शुक्ला को गोलियों से छलनी कर दिया । इससे भी बड़े आश्चर्य की बात है कि दुबे ऐसा अपराध करने के बाद भी आसानी से बच निकला । इसके बाद तो जैसे विकास का डर ही मर गया ।
कहते हैं बिकरु गांव को उसने अपना गढ़ बना लिया था । यहां छोटी जाति के लोग उसकी मर्ज़ी के बिना कुएं से पानी तक नहीं भर सकते थे । वो हमेशा कहा करता था "पंडित को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है ।" उसके इसी अभिमान ने उससे आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करवायी और अनजाने में उसके ही हाथों उसकी ही मौत की कहानी लिखी गई । उसने फिल्में तो खूब देखीं लेकिन वो इस बात से अनजान रहा कि हर अपराधी का अंत उसकी मौत से ही होता है ।

इस जाति और पॉवर के अभिमान ने सिर्फ दुबे को ही नहीं गढ़ा बल्कि इसके जैसे बहुत से बाहुबली यूपी में अभी भी मौजूद हैं । विकास दुबे और इन सब में बस यही फर्क है कि विकास राजनीति में आने का सपना देखते देखते पुलिस की गोली का शिकार हो गया लेकिन ये लोग पहले से ही राजनीति में सक्रिय हैं ।

इन सवर्ण बहुबलियों में सबसे पहला नाम आता है राजा भईया रघुराज प्रताप सिंह का । इस बाहुबली को किसी पार्टी से कुछ लेना देना नहीं बल्कि ये निर्दलीय ही अपना राज चला रहा है । डीजीपी जियाउल हक़ सहित कई अन्य हत्याओं के आरोप हैं इस बाहुबली के सिर पर ।
इसी तरह बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी पर हत्या फिरौती सहित अन्य 25 मामले दर्ज हैं । हरिशंकर तिवारी पहला ऐसा नेता रहा जिसने जेल में रहते हुए चुनाव जीता ।

इसी तरह जौनपुर के बाहुबली नेता धनंजय सिंह तथा बसपा नेता गुड्डू पंडित भी इस लिस्ट में शामिल हैं । इन लोगों पर दर्जनों मुकदमे हैं लेकिन फिर भी ये आज़ाद हैं क्योंकि इनके नाम के साथ अब नेता जुड़ चुका है ।

विकास दुबे अगर मारा ना जाता तो शायद कुछ समय बाद वह भी इस देश का एक नेता होता। अब ये कहा जाए तो कहीं से गलत नहीं होगा कि राजनीति हमेशा से इन बदमाशों को संरक्षण देती आई है ।

19 

Share


Saurabh Zemse
Written by
Saurabh Zemse

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad