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वक्त....?

Bhawna Nagaria
Bhawna Nagaria
12th Jul, 2020

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जीवन की आपाधापी मे ,कब वक़्त मिला ,
जो सोच सकूं,जो किया,कहा, माना उसमे क्या बुरा भला।

मैं भी खड़ा हुआ हूं , इस दुनिया के मेले मे ,
जहां हर इक लगा है , अपनी लेने देने मे ।

बनकर इस मेले का हिस्सा , मैं भी इस भीड़ मे खो गया,
स्वहित मे सदा लगा रहा , मैं अपनों को ही भूल गया ।

मैं भूल गया , मैं चूक गया ,
बन कठपुतली ... मैं भी खूब नचा ,
इस मायावी संसार मे ...
मैं अपनों ही हाथों खूब लुटा ।

वक्त नहीं है ... वक्त नहीं है, यह कहते कहते वक़्त कटा,
सहसा ही एक ठोकर ने ,इस वक्त से मुझे मिला दिया ।

तन्हा था मैं. ..सहमा था मैं ,
मेले की इस भीड़ में , खड़ा आज अकेला था मैं ,
काया-माया के फेर में ,
इनसे ही छला गया था मैं ,
वक्त के हाथों खूब लुटा मैं,
कुछ कच्चा... कुछ पक्का था मैं ,
उस सत्ता का एहसास हुआ ,
उस रब का अब दीदार हुआ ,
क्या छूटा ...क्या रूठा मुझसे ,
इन सबसे आजाद हुआ ।



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