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‘शहरी गृहणी’: स्वयं को स्थापित करें

Tanaya Godbole
Tanaya Godbole
10th Jul, 2020

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‘शहरी गृहणी’ शब्द सुनकर  कुछ चित्र उभरने लगते हैं। स्टाइललिस्ट कपड़े, मेकअप से सराबोर, किटी पार्टी में जाने के लिए बैचेन, नए-नए फैशन और उन फैशन को दिखाने का जूनुन, मुंह पर फर्राटेदार इंग्लिश और ना जाने क्या-क्या। इन सब बातों को सुनकर ऐसा लगता है जैसे शहर में रहनेवाली गृहणियां  घर में ना होकर सिर्फ अपने आप में होती हो। अगर इन सबको अपना लिया तो एडभांस और ना अपनाया तो शहर में रहकर भी पिछड़ी हुई है।  यानि कहने का मतलब ‘ना उगलते बने और ना निगलते बने’ अर्थात ना करते बने और नही ’ंना’ करते बने। हम आज उसी शहरी गृहणी के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।


बदलते वक्त के साथ गृहिणियों की भूमिका भी बदल गई है। उनकी जिम्मेदारियां कम न हो कर और बढ़ गई हैं। गृहणी शहरी हो या ग्रामीण दोनों का जीवन शांतिपूर्ण नहीं होता। दोनों की अपने-अपने चैलेंज होते हैं। जिम्मेदारियां तो पहले भी थीं, लेकिन दायरा सीमित था। मगर आज दायरा असीमित है। आज महिला घर से ले कर बाहर तक की जिम्मेदारी के साथ साथ बच्चों की पढ़ाई से ले कर सब का भविष्य बनाने और भविष्य की बचत योजना तैयार करने में जुटी रहती है और वह भी पूरी एकाग्रता से।

बात अगर ‘शहरी गृहणियों’ की करें तो उनका जीवन इतना आसान नहीं होता। बाहरी जिम्मेवारियों का निर्वहन करने के साथ उनसे घर की जिम्मेवारियों को भी बेहतर से निभाने की आशा की जाती है। शायद इसी आशा को बनाए रखने के लिए वे अपने ऊपर इतना बोझ ले लेती हैं कि कभी-कभी उन्हें अवसाद जैसी मानसिक बीमारियों तक की शिकार हो जाती हंै। उनके पास इतना वक्त नहीं होता कि वे स्वयं के लिए कुछ विचार कर सके। रात को सब के बाद अपने आराम की सोचती है। रोज पति, बच्चों और घर के अन्य सदस्यों की देखरेख में इतनी व्यस्त रहती है कि खुद को हमेशा दोयम दर्जे पर ही रखती है। वह दूसरों की शर्तों, इच्छाओं और खुशियों के लिए जीने की इतनी आदी हो जाती है कि अगर किसी काम में जरा सी भी कमी रह जाए तो अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती है। लेकिन उस के बाद भी उसे ताने ही सुनने को मिलते हैं। उस के काम का श्रेय और सम्मान उस के हिस्से नहीं आता।

शहरी गृहणियां परिवार की जिम्मेवारियों को पूरा करते हुए अपने पति की सहभागी भी बन जाती हैं। यही कारण है कि परिवार की खर्चे को बांटने के लिए वे घर से बाहर नौकरी करने को निकलती हैं। नौकरी में अपने आप को स्थापित करने के लिए भी उनकी पूरी कोशिश होती है। नौकरी से मिलने वाले पैसे से अपने परिवार की सहायता करने के साथ-साथ वे अपने आप को आत्मविश्वासी भी बनाती है। शहरी गृहणियों का यही आत्मविश्वास उन्हें कभी पीछे हटने नहीं देता। घर से बाहर तक स्थापित करना उनके लिए आसान हो जाता है अगर उनका कोई साथ देनेवाला हो।

‘शहरी गृहणियां’  आत्मविष्वास से लबरेज उस सूर्य के सामान होती हैं जो बादल होने पर छुप तो सकता है लेकिन अपनी रोशनी नहीं खो सकता। यही आत्मविश्वास है कि किसी भी कठिन परिस्थिति होने पर वे घर से बाहर हरेक मोर्चे को एक योैद्वा के संभाल संभालती हैं। वह योद्वा जिसने कभी हारना नहीं सीखा। शायद औरत की यही विशेषता होती है कि ‘नारी को जग की धूरी’ कहा जाता है।

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