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क्यूँ याद किए जाए चन्द्रशेखर ?

जयपालसिंह गिरासे
7th Jul, 2020

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*क्यूँ याद किए जाए चन्द्रशेखर?*
(चन्द्रशेखर की विरासत)
- डा०(पूर्व मेजर) हिमांशु,
(संयोजक 'चन्द्रशेखर के अपने'/गंगाजल बिरादरी)

पूर्व प्रधानमंत्री स्व० चन्द्रशेखर जी आज अपनी 14वीं पुण्यतिथि पर क्यूँ आैर कैसे याद किए जाए? हमारे जीवन के कुछ अन्य प्रधानमंत्रियों के संदर्भ में इस प्रश्न का उत्तर आसान है। जहाँ, इन्दिरा जी को 1971 के प्रखर राष्ट्रवाद और 1977 के आपातकाल से, विश्वनाथ प्रतापसिंह जी को मण्डल कमीशन, अटल बिहारी बाजपेयी जी को गैर कांग्रेसवाद, नरसिम्हा राव जी या मनमोहन सिंह जी को भूमण्डीकरण के दौर में आर्थिक सुधारों की विरासत से परिभाषित किया जा सकता है, वहाँ हमेशा बडा पद मिलने की सुविधा होने के बावजूद, बिना किसी पद पर रहे सीधे प्रधानमंत्री बने चन्द्रशेखर जी को ऐसी कोई सुविधा नहीं है।
अधिकतर अन्य प्रधानमंत्रियों के बनने, संवरने में उनके पीछे उनके स्थापित दल या संगठन रहे, जो उनकी विरासत को संरक्षित करने या उसका दावा करते हैं। चन्द्रशेखर जी को यह सुविधा भी नहीं है। भारत में राजनैतिक नेता जहाॅं जाति -सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा से पहचान या उर्जा पाते हैं, चन्द्रशेखर उसके भी दोषी या लाभार्थी नहीं हैं।
किसी भी राजनीतिक व्यक्ति में जो गुण अवगुण सम्भव है चन्द्रशेखर जी में सब हैं, पर उनके अवगुणों में पाखण्ड कभी नहीं रहा। व्यवहारिक राजनीति की जिन मजबूरियों को आम नेता मानने से सार्वजनिक तौर पर कतराते हैं चन्द्रशेखर जी ने उन्हें सहजता से स्वीकारा। उन्होंने कई प्रयास सिद्घान्त आैर व्यवहार की खार्इ पाटने के किए। राजनीतिक विश्लेषको के अनुसार भारतीय राजनीति के स्वभाविक किन्तु कटुतापूर्ण ध्रुवीकरण को नकार, राजनीतिक दलों के बीच चौडी होती खार्इयों को भी व्यक्तिगत क्षमता व सम्बन्धों से देशहित में पाटने में चन्द्रशेखर जैसे महान नेता की विरासत गुम सी हो गयी। उनकी निष्ठा व प्रतिबद्घता दलीय राजनीति से ज्यादा हमेशा मुददो और विचारधारा के प्रति रही। बात सिरे भले न चढ पायी, पर इन्दिरा - जे०पी० विवाद में निर्वाचित राजसत्ता और नैतिक लोक सत्ता के बीच पुल युवा तुर्क चन्द्रशेखर ही बने। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से उनके व्यक्तिगत समीकरणों के कारण, बिना किसी प्रचार श्रेय के एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ के परिवार के सदस्य आैर विदेशी इंजीनियर की आतंकवादियों की गिरफ्त से रिहाई सकुशल सम्भव हुई।
दलों से ऊपर उनका विस्तृत प्रभामण्डल ही था कि उनके द्वारा गठित शरदजी पंवार, भैरोसिंहजी शेखावत और मुलायम सिंह जी की संयुक्त कमेटी की देखरेख में आम सहमति से अयोध्या विवाद 1991 में ही समाधान के एकदम करीब पहुंच गया था, पर सरकार चली गयी। जानकारो के अनुसार यदि चन्द्रशेखर राजीव गांधी जी के आकंलन की गलती को माफ कर उनका आग्रह मान, इस्तीफा न देते या प्रणव मुखर्जी के हाथो राजीव जी के संदेश को मान दोबारा शपथ ले लेते तो भारतीय राजनीति की दिशा कुछ और होती। चन्द्रशेखर निर्लिप्त नहीं थे, निर्मोही अवश्य थे, घोर स्वाभिमानी भी। वो इन्द्र के सिहांसन को लात मारने की परम्परा वाली भृगु ऋषि की मिटटी के बने थे। कन्याकुमारी से दिल्ली तक छह महीने पैदल चलने वाले गांधी-बुद्घ की परम्परा के फक्कड मस्त पदयात्री चन्द्रशेखर। इस्तीफे बहुतो ने दिये, वापस न लेने वाले सिर्फ चन्द्रशेखर।
देश की समस्याआें के समाधान हेतु चन्द्रशेखर जी ने दलीय छुआछूत को तो कभी नहीं माना पर पिछले 30 साल से मण्डल कमण्डल की जातिवाद और साम्प्रदायिकता के इर्द गिर्द सिमटी राजनीति से वो तालमेल नहीं बिठा पाए आैर वोट की राजनीति में पिछड़ते चले गये। इसके बावजूद इस शाश्वत विद्रोही युवा तुर्क, आम आदमी की खास आवाज,बेबाक राय, आमोखास में राष्ट्रीय विवेक की अभिव्यक्ति को संसद आैर बाहर, देशी-विदेशी ताकते उसकी चमक कम कर हाशिए पर नहीं डाल पायीं। चन्द्रशेखर जी का मानना था कि सतत जागरूकता ही आजादी की कीमत है, जमानत भी। संकट में चुप्पी मौकापरस्त आेढते हैं, रणनीति बताकर या बनाकर। उन्मादी जनता के अविवेक का लाभ उठा शिखर पर पहुँचने को चन्द्रशेखर जी ने नेतृत्व का गुण नहीं, अवसरवाद ही माना। मजाक में वो कहते भी थे कि लालचियों आैर मूर्खो के गांव में ठग भूखा नहीं मरता। देश जनता के हित में राजनीतिक खामियाजा उठा एेसे उन्मादी अविवेकी जनमत के खिलाफ खडा होने का उन्होंने हमेशा साहस दिखाया आेर इसे राजनेता का कर्तव्य माना। यह गुण उन्हें सामान्य नेता से अलग आैर ऊपर स्टेटसमैन राजनेता बनाता है। यही वजह है कि सत्ता के अवसर नकार इन्दिरा जी से सम्बन्धों के बावजूद आपातकाल पर सवाल खडा कर उन्होंने 19 महीने जेल काटी और अपनी छवि और चुनाव हारने का जोखिम उठाकर भी उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार के तरीके का विरोध किया। इन्दिरा सरकार में जेल काटने के बावजूद जनता पार्टी सरकार में जब इन्दिरा जी से ज्यादती हुई तो बिना किसी कटुता के, वो बतौर जनता पार्टी अध्यक्ष अपनी सरकार से भी भिड़ने से पीछे नहीं हटे।
कारगिल युद्घ और संसद हमले पर उन्होंने अपने काफी करीबी अटल बिहारी बाजपेयी गुरूदेव को भी सवालों के कटघरे में खडा किया। आत्ममुग्धता में डूबी सरकार से सीधा सपाट सवाल, देश और संसद की जिम्मेदारी पाकिस्तान शासन की है या भारत सरकार की। सीधा सवाल लाजवाव। चन्द्रशेखर होते तो पक्का आज की सरकार से पूछते कि यदि कोरोना संकट वास्तविक है तो 'नमस्त ट्रम्प' क्यूं? और यदि संकट सरकार की समझ से 'नमस्ते ट्रम्प' टालने लायक गंभीर नहीं था तो टोटल लाॅकडाऊन क्यूँ? सीधी बात नो बकवास।
आज कई दशक बाद आपातकाल, ब्लूस्टार, बोफोर्स, भूमण्डलीकरण, निजीकरण, मण्डल-कमण्डल राजनीति पर उनके सवाल सही साबित लगते हैं। संसद के अन्दर बाहर सत्ता से निर्भीक दो टूक सवाल पूछना इस दूरदर्शी सर्वश्रेष्ठ आंके गए सांसद की विरासत है। विश्व बैंक के वार्इस प्रेजीडेण्ट ने आर्थिक संकट से जूझ रही चन्द्रशेखर सरकार को जब दबाव में लेने की कोशिश की तो देश की जनता पर यकीन रख चन्द्रशेखर उस स्थिति में जीवन रक्षक दवाओं और पैट्रोल पदार्थो को छोड सभी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने की मजबूरी के अपने मत से उसे निरूत्तर कर दिया। यह था बाजार ढूँढती विदेशी ताकत को देशी जवाब। संकट में सिर्फ सवाल नहीं, सख्त निर्णय लेना और माकूल जबाव देना भी चन्द्रशेखर की विरासत है।
आज लद्दाख की गलवान घाटी में चीन की अतिक्रमणकारी गतिविधियों जैसे सवालों पर सरकार को गोपनीयता, सुरक्षा आैर उन्माद के पीछे अपनी जबावदेही जिम्मेदारी से न बचने देने और विपक्ष को देशहित में जिम्मेदार करने के लिए चन्द्रशेखर की जरूरत महसूस होती है, क्योंकि यही वह घर है जहाँ बिना कटुता सब आ सकते थे। यह भी चन्द्रशेखर जी की विरासत है जो उन्हें सांसदीय राजनीति का भीष्म पितामह आैर भारतीय राजनीति का अजातशत्रु बनाती थी। वो एक माली है जिन्होनें अपने छोटे से कार्यकाल में दृढता आैर विवेक से मण्डल मंदिर की आग में जल रहे देश के ठण्डे पानी की तरफ आग को शान्त किया। आतंकवाद से ग्रस्त असम, पंजाब आैर कश्मीर में मरहम सा काम किया। उन्होंने पटियाला जेल आैर भोण्डसी आश्रम को ही नहीं भारतीय राजनीति को भी नये-नये पेड पौधे रोप खाद पानी दे हरा भरा किया। उनके लगाये पौधे आज लगभग सभी दलों में हरे भरे पेड आैर वट वृक्ष बन चुके हैं। चन्द्रशेखर किसी अर्जुन या एकलव्य से अंगूठा मांगने वाले द्रोणाचार्य कभी नहीं रहे। किसी सांस्कृतिक मिथक से यदि उनकी तुलना सम्भव है तो वो है भोले शंकर। भोले शंकर समाजवादी। फिर भी संभव है समुचित अवसर न मिलने के कारण इतिहास चन्द्रशेखर जी के योगदान व व्यक्तित्व से न्याय नकर सके। यह चन्द्रशेखर जी का र्दुभाग्य है। यह टीस चन्दशेखर जी के मित्रों, साथियों, शिष्यों और अनुयायियों को हमेशा रहेगी। वो सत्ता में रहते तो कई समस्यायें जिनसे देश दशको से त्रस्त रहा उनका समाधान तभी हो जाता, यह देश की हानि है।
अतः आज विद्वेष और विभाजन की राजनीति के दौर में, इन सामाजिक राजनीतिक खाईयों को पाटने के लिए, जरूरी है भारतीय समाज और राजनीति समन्वयवादी व्यवहारिक राजनीति की चन्द्रशेखर शैली को संस्थागत रूप दें।
लेखक:
पूर्व मेजर (डा०) हिमांशु
gangajalbiradari@gmail.com 9411883676
Banglow No. 8, R.A.Lines 9412109338
MEERUT CANTT -250001 012172972876(Res.)


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जयपालसिंह गिरासे

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