Bluepad‘कांचीपुरम’ साड़ी में दिखती है ‘दक्षिणी छवि’
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‘कांचीपुरम’ साड़ी में दिखती है ‘दक्षिणी छवि’

Subhash
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3rd May, 2020

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कांचीपुरम सिल्क साड़ी भारत के तमिलनाडु में कांचीपुरम क्षेत्र में बनाई जाने वाली एक प्रकार की रेशम साड़ी है। यह साड़ी आज महिलाओं की पहली पसंद बन गई है। यह सिल्क साड़ी सिर्फ दक्षिण हीं नहीं पूरे भारत में पसंद की जा रही है। दक्षिण के मंदिरों में पुजारी कांचीपुरम सिल्क का इस्तेमाल देवी-देवताओं को सजाने के लिए भी करते हैं। वहीं हिंदी फिल्म जगत की मशहूर अभिनेत्री रेखा का कांचीवरम साड़ी पे्रम विख्यात हैं। रेखा को ‘कांचीवरम क्वीन’ तक कहा जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कांचीपुरम साड़ी की तस्वीर एक पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर जगह पा चुकी है। इन साड़ियों को बनाने में अधिक समय लगता है क्योंकि इसमें हाथ की कारीगरी होती है।

दक्षिण के तमिलनाडु में स्थित कांचीपुरम में जो साड़ी बनती है वह साड़ी कांचीपुरम या कांजीवरम साड़ी नाम से विख्यात है। कांचीपुरम को पूर्व में कांची कहा जाता था और अब यह कांचीवरम के नाम से भी प्रसिद्ध है। कांचीपुरम को भारत के सात पवित्र शहरों में से एक का दर्जा मिला हुआ है। इसलिए यहाँ साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। यहां के बुनकरों द्वारा बनाई जानेवाली कांजीपुरम साड़ी आज शादी विवाहों के लिए पहली पसंद बनती जा रही है। इन कांजीपुरम साड़ी की डिजाइन पर दक्षिण भारत के मंदिरों के डिजाइन जैसे पक्षी, पत्ते और बाकी प्राकृतिक चीजों से की छाप दिखाई देती है। कभी-कभी कांजीवरम साड़ी के ताने-बाने में, कांचीपुरम के मंदिर की दीवारों और खंभों के पैटर्न उकेरे जाते हैं। साड़ी के ताने-बाने में बुनी जाने वाली कई पारंपरिक आकृतियों को देखकर ही पता चल जाता है कि वे सीधे तौर पर मंदिर के कई तरह के डिजाइन से प्रेरित हैं।

कांचीपुरम को हजारों मंदिरों के शहर के तौर पर जाना जाता है। इसे दक्षिण् का काशी भी कहा जाता है। यहां के मंदिर के वास्तुकला और डिजाइन कांचीपुरम के बुनकरों को हमेशा से प्रेरणा देते रहे हैं। कांचीपुरम साड़ी के बॉर्डर (किनारे या किनारी) के सबसे मशहूर पैटर्न में से एक ‘रुद्राक्षम’ है। इसमें साड़ी की किनारी पर पवित्र रुद्राक्ष के मनके का डिजाइन बनाया जाता है। साड़ी के पैटर्न के लिए मंदिर के ‘गोपुरम’, ‘मयिलकन’ या मोर की आंख और ‘कुयिलकन’ या बुलबुल की आंख से प्रेरणा ली जाती है।

कांजीपुरम सिल्क साड़ी में बुनाई के लिए सुनहरे धागे का इस्तेमाल किया जाता है। कांचीपुरम सिल्क साड़ी लेने से पहले यह जानना जरूरी है कि यह सिल्क की साड़ियां हमेशा चमकीली होती है। अगर इसकी चमक फीकी है तो यह असली नहीं है। वैसे इन साड़ी की जरी को खुरचकर भी इसको परखा जाता है। अगर इसके नीचे लाल सिल्क निकले तो इसका मतलब होता है कि आपकी साड़ी असली है अगर ऐसा नहीं है तो आपकी साड़ी नकली है। कांजीवरम सिल्क साड़ी को इसके अलग रंग के धागे एक अलग ही चमक देते हैं। रोशनी बदलने पर असली सिल्क का रंग भी बदला हुआ दिखता है। कांजीवरम साड़ियां खास तौर पर, अपने सुनहरे किनारों और एक-दूसरे से अलग रंगों से बने घने ब्रोकेड (साड़ी का एक हिस्सा) की वजह से जानी जाती हैंै इन्हें सिल्क के रंगीन धागों और जरी (चांदी और सोने से बने सिल्क के धागे) का इस्तेमाल करके पूरी तरह हाथों से बनाया जाता है। ये साड़ियां अपनी खूबसूरती, बनावट, चमक, और मजबूती के लिए लोकप्रिय हैं।

कांचीपुरम साड़िया आज भी हाथ से ही बनाइ्र जाती है। हालांकि कंप्यूटर से डिजाइन में इसकी मदद ली जाती है। इन साड़ियों में बहुत कम काम ऐसे होते हैं जो मशीनों से किया जाता है। यही कारण है कि इन साड़ियों के बनने में कारीगर और समय अधिक लगता है। अभी भी इन साड़ियों को बनाने में अधिकतर काम पुराने जमाने के तरीकों से किया जाता है। कांचीपुरम में देवांग और पट्टू सालियर समुदाय के 45,000माहिर बुनकरों का घर है। ये समुदाय, बुनाई की कला में महारत रखने के लिए जाने जाते थे। इन समुदायों ने कांचीपुरम को कारोबार के खास केंद्र के तौर पर उभरने में मदद की।

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