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फेअर नहीं सिर्फ लवली...

Mridula Shinde
Mridula Shinde
3rd Jul, 2020

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भारत जैसे विकसनशील देश में अगर व्यापार करना हो तो उसके लिए कच्चा माल क्या हो सकता है? तो वो है हीन भावना। इसके इस्तेमाल से व्यापारी एक ऐसा उत्पाद बनाते हैं जिसका वास्तव में कोई उपयोग नहीं होता। इस उत्पाद के वो ऐसे विज्ञापन बनाते हैं मानो अगर वो उत्पाद आपने ना खरीदा तो आपके जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। काला, सांवला या गहरे साँवले रंग ने यहाँ के लोगों और खासकर औरतों के जहन में हीनता की परत चढ़ाई हुई थी और फेअरनेस क्रीम वालों ने उसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारतियों के लिए “भेद” कोई नई बात नहीं है। एक इंसान से दूसरा अलग होना यह प्रकृति का नियम है। लेकिन भारत में जाती-धर्म-वर्ण के नाम पर हर इंसान पहचाना जाता है। अखबारों के शादी-ब्याह के पन्नों पर “गोरी वधू चाहिए” और किसी विशिष्ट धर्म या जाती समुदाय की ही वधू चाहिए इस तरह के विज्ञापन रोज आते है, यह देख कर एक सिने में चुभन सी लगती है। अखबार भी ऐसे विज्ञापनों को अपनी जगह क्यूँ देते हैं? लेकिन ग्राहक को जो चाहिए वो उसे देना यह बाजार का पहला नियम है। शादी तय करने वाले और अखबार वही तो करते हैं।

इन विज्ञापनों की वजह से “गोरा ही सर्वोत्तम रंग” इस तैयार हुई मानसिकता का शिकार होती है यहाँ की गहरे और साँवले रंग की लड़कियां। यहाँ लड़कों के बारे में वर्णभेद करने की कोई मंशा नहीं है लेकिन अपना रंग जैसा भी हो, हमें बीवी चाहिए तो गोरी ही, बस्स! यह उन लड़कों के दिमाग में चिपकाया जाता है। अपनी साँवली बेटी की शादी हो जाए इसलिए उसे पढ़ लिख कर काबिल बनाने वाले कई सारे मातापिता हैं। लेकिन ऐसे मातापिता को भी “पढ़ी लिखी है फिर भी रंग गहरा है” यह बात तो सुननी ही पड़ती है। अगर बेटी पढ़ने में आगे बढ़ ना सकी तो उसकी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं होता। दोनों सूरत में जमकर दहेज लिया जाता है और साथ में “हमने अगर आपकी बेटी को ना कह दिया तो कोई उसे नहीं ब्याहेगा” यह भी सुनाते हैं। दहेज देने के बावजूद लड़की का जीवन आसान नहीं होता। उसे कदम कदम पर अपने साँवले, गहरे रंग पर ताने सुनने पड़ते हैं। लड़कियों के इसी दर्द को फेअरनेस क्रीम वालों ने भुनाया। जहां इन सुंदरता के ठेके वालों ने रंग और सौंदर्य की तरफ देखने का नजरिया बदलने के प्रयास करने चाहिए थे वहाँ वो लड़की को प्रकृति से मिले रंग को रसायनों की मदद से बदलने का इंतजाम करने लगे.

“मैंने जो भुगता है वो मेरी बेटी को भुगतना ना पड़े” यह सोचकर महीने के अपने खर्चे में से पैसे बचाकर वो औरत “फेअर एंड लव्हली” खरीदने लगी और अपने बच्ची को गोरा बनाने का प्रयास करने लगी, तो इसमे उनका क्या दोष? गोरा करने वाली क्रीम आसानी से और सस्ते दाम पर मिल जाए तो वो किसे नहीं चाहिए? वो भले ही मेडिकली प्रूवन ना हो, लेकिन इससे किसे क्या फर्क पड़ता है? रंगभेद तो अफ्रीका अमेरीका में होता है, हमारे यहाँ होता है तो बीवी, असीस्टंट, सेक्रेटरी, कर्मचारी, न्यूज अँकर, अभिनेत्री मतलब कि अपने संपर्क में आने वाली हर महिला सिर्फ गोरी हो, यह जुनून। “फेअर एंड लव्हली” ने इसी जुनून को भुनाया। लड़कियों के सपने पूरे करने का आश्वासन देकर अपनी तिजोरियाँ भरी।

फार्मास्यूटिकल्स के समूह में न आने वाली यह क्रीम्स दरअसल हमारी त्वचा को नुकसान पहुँचती है। त्वचारोग विशेषज्ञ बताते है कि इन क्रीम्स में त्वचा को ब्लीच करने वाले स्टीरोइड्स, पारा और केमिकल सॉल्ट जैसे घातक एजंट होने की संभावना होती है। लेकिन हिंदुस्तान युनिलीवर के प्रवक्ता ऐसे कुछ एजंट क्रीम में होने से साफ इंकार कर देते हैं। और बताते हैं की उनके उत्पाद को अन्न और औषध प्रशासन की मंजूरी मिली है। यह मंजूरी किस आधार पर मिली है यह जांच का विषय हो सकता है। दरअसल भारत उष्ण कटिबंधीय देश है, इसलिए यहाँ साँवली त्वचा सबसे अच्छी त्वचा होती है। ऐसी त्वचा में होने वाला मेलनिन सूरज की तेज किरनों की तीव्रता कम करता है। और फेअरनेस क्रीमवाले बराबर इसका उल्टा बताते है और अपने विज्ञापनों के जरिए मेलनिन कम करने की गलत धारणा फैलाते हैं।
इन क्रीम्स से कोई फायदा नहीं होता यह बारबार बताने के बावजूद यह फेअरनेस कंपनियाँ गोबेल्स नीती पर चलते हुए नई नई मॉडेल्स के जरिए विज्ञापनों की बौछार करते रहे। अपने हुनर के बलबूते लड़कियों ने अपने सपने पूरे किए लेकिन पिछले ४५ वर्षों में हिंदुस्तान युनिलीवर ने अपना साम्राज्य फैला दिया। लेकीन जिनके दिमाग सातवे आसमान पर चढ़ जाते हैं उन्हे एक ना एक दिन जमीन पर आना ही पड़ता है। अभय देओल, नंदिता दास ने गोरेपन को सौन्दर्य कहने से और रणबीर कपूर, स्वरा भास्कर, सुशांत सिंह राजपूत ने ऐसे विज्ञापन करने से मना कर देने के बाद और कुछ याचिकाओं की वजह से हिंदुस्तान युनिलीवर ने अपनी क्रीम के नाम से “फेअर” यह शब्द निकाल ने का निर्णय लिया है। इसे “सौ चूहे खाके बिल्ली चली हज को” कह सकते है लेकिन इसके साथ “देर आए दुरुस्त आए” कह कर उनके इस पहल की सराहना भी करनी चाहिए। समाज के बदलाव पानी की तरह ऊपर से नीचे की ओर बहते है। आशा करते हैं कि गोरे रंग का यह टॅबू भी जल्द ही खतम हो जाएगा।

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