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कोरोना से बदला जीवन

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Ankita Desai
2nd Jul, 2020

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संकट की घड़ी में ही इंसान की क्षमताएं उभर कर आती है। इसकी सीख हमें प्रकृति से बारबार मिलती है। जैसे एक चींटी कई सारी मुश्किलों का सामना करते हुए अपना खाना अपने बिल तक पहुँचाती है। नदी के बहाव में कितने भी पत्थर आएँ, ढलाने आएँ, लेकिन वो रुकती नहीं, बहती रहती है और एक झरना बन कर और भी खूबसूरत बनती है। इन्सान पर भी वही बात लागू होती है। जिंदगी की तपिश में भून कर इंसान हीरे जैसा चमक उठता है। आज कोरोना की महामारी से पूरी दुनिया एक ऐतिहासिक संकट के दौर से गुजर रही है, तब इंसान को न सिर्फ अपनी बल्कि प्रकृति की क्षमता और असीम सौन्दर्य का भी दर्शन हो रहा है।

हमारे संतों ने हमसे कहा था की ईश्वर यह इंसान की बनाई धारणा है। लेकिन इस बात को नजरंदाज कर किसी दैवी शक्ति के आगे झुकने के स्वभाव को हम बढ़ावा देते रहे। यह स्वभाव इतना बढ़ गया है कि पेड़ के नीचे अगर कुमकुम लगा पत्थर दिख जाए तो उसके सामने हात अपने आप जुड़ जाते हैं। लेकिन आज की इस महामारी ने हमे बताया है कि संकट के समय भगवान नहीं बल्कि डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ दौड़ा आता है। हमारी रक्षा के लिए ग्रह तारे नहीं, बल्कि अपनी जान की फिकर किए बगैर गली मुहल्लों में पुलिस तैनात रहती हैं। कोरोना यह एक विषाणु है और उससे कोई भी और कहीं भी संक्रमित हो सकता है यह पता होने के बावजूद डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ, आरोग्यकर्मी, पुलिस और स्वच्छता कर्मी दिन रात अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। आज पता चल रहा है कि हमारे देश में जीतने प्रार्थना घर है उससे कई गुना कम स्कूल और अस्पताल हैं। गौरतलब है की, वो प्रार्थना घरों को ताले ठोकने की नौबत आई है और अस्पतालों की कमी महसूस हो रही है। इस घड़ी में किसी भी श्रद्धा से मानवसेवा सबसे बड़ी सेवा है और वो सेवा करने वाले ईश्वर से कई गुना महान है, इसकी समज आ गई है।

हम अब जान चुके है की घर बैठे भी हम कई सारे काम कर सकते हैं। आरोग्य, पुलिस, स्वच्छता, परिवहन, सब्जियाँ और दूध जैसी अत्यावश्यक सेवाओं के लिए बाहर जाना ही पड़ेगा। इसके अलावा बाकी कई काम हम घर बैठे या अपने इलाके में रहकर ही कर सकते हैं। मुंबई जैसे शहर में लोकल ट्रेनों में होने वाली भीड़ इससे कई ज्यादा कम हो सकती है। लोगों को जान पर खेल कर अपने काम के लिए जाने की जरूरत वास्तव में नहीं है। कार्यालय में जिसकी जब जरूरत हो तब सिर्फ उसे तलब किया जा सकता है। इस तरह से भीड़ और भीड़ से निर्माण होने वाली समस्याओं का हल निकल सकता है। यातायात कम होने से लोगों में जाया होने वाली ऊर्जा बरकरार रहती है, घर वालों के साथ ज्यादा समय बिताने का मौका मिलता है और अपने पसंदीदा काम करने के लिए वक़्त मिलता है।

इस काल में हमने देखा है कि यातायात कम होने से पेट्रोल डिझल का उपयोग कम होता है और इससे पर्यावरण में प्रदूषण की मात्रा कम होती है। हवा में कार्बन की मात्रा कम होने से हमने कई सुंदर दृश्य देखे जैसे कि किसी ने चंडीगढ़ के अपने घर की बाल्कनी से चाँदी की परत जैसी दिखने वाली हिमालय की परबत शृंखला के फोटो शेअर किए। वहीं हमने मोर, हिरन और शेर जैसे जानवर रस्तों पार्न टहलते देखें जो आमतौर पर बस्तियों में नहीं आते। हमने यह भी मान लिया कि यह तो उन्ही का घर है, हमने उनके घर में घुसपैठ की है। प्रदूषण कम होने से नदियों का पानी साफ हो गया है। हमारी करतूतों की वजह से हमने नदियों के बहाव को भी रोक रखा था। इसका परिणाम भी हम भुगत रहे थे। क्यूंकी हमने ही दूषित किए नदियां और कुएं के वही गंदे पानी पर फलीफुली खेती से निकलने वाली उपज हम खाते हैं जिसका विपरीत परिणाम हम पर होता है। इसलिए अगर प्रकृति को उसके नियमानुसार चलने का मौका मिल जाए तो इसके परिणाम बहुत सुखद होते हैं। यह परिणाम हमेशा के लिए वैसे ही रखने के लिए लोगों की यातायात और प्रकृति से संसाधन छिनने पर रोक लगाने के लिए हमे कुछ पहल करनी पड़ेगी।

हमने देखा कि हम मॉल्स, हॉटेल्स, मोटेल्स, पब्स, क्लब्ज के बगैर उपलब्ध वस्तुओं पर भी गुजारा कर सकते हैं। बच्चों को पिझ्झा, बर्गर, कोक और बड़ों को दारू, सिगरेट, गुटखा के बगैर भी रहा जा सकता है इसका अहसास हो गया है। हम घर का पका खाना सब मिलकर साथ बैठ कर खाने से पैसों की बचत और खुशियों की बरसात कर सकते हैं।

हमारे इर्द गिर्द रहने वाले मजदूर वर्ग के लिए अब हमारे दिलों में सहानुभूति है। अपनी आँखों में बेहतर जिंदगी के सपने लिए शहरों की तरफ रुख करने वाले मजदूरों को सिवाय गरीबी के कुछ नहीं मिला। हमारी नजरों में उनके लिए अब तो प्यार पनपे, यही आशा।

इस विषाणु के सामने अमरिका, इंग्लंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली जैसे ताकतवर कहे जाने वाले देशों ने भी घुटने टेक दिये है। इन देशों में जाने वालों लोगों के लिए हमारे दिल में कुछ ज्यादा ही लगाव होता है। लेकिन अब हमे पता चला है की दिखावा और असलियत में फर्क होता है। विदेशों में जाने वालों के बारे में हमे आदर होना भी चाहिए लेकिन वो जिस काम या पढ़ाई के लिए जाते है उसके लिए होना चाहिए, उनके महज विदेश जाने पर नहीं। इसके अलावा पूरी दुनिया पर राज करने का मनसूबा रखने वाले चीन जैसे देश पूरी दुनिया को संकट में झोंक देते हैं। ऐसे देशों की पैरवी करने से पहले हम पर जो बीत रही है उसपर सोचे।

चीन ने जो किया वो गलत ही है लेकिन इस काल में हमें जीवन के बारे में जो सीख मिली है वो जाया न हो। हमने उस सीख पर इतना अमल करना जरूरी है कि आने वाली कई पीढ़ियों को उसका फायदा हो।

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Ankita Desai

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