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G.s.bist
1st Jul, 2020

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जब एक - दो मील ही पैदल चलने की बात आती है,
तो मेरे माथे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं।
टी बी पर देखा, मजदूरों को धूप में , पैदल चलते,
कन्धे पर बच्चा ,सर पर सामान ,हाथों से थेले लिए ,
खुद बेबस , और निराश मन ,पर ,
पत्नी और बच्चों की हिम्मत बढ़ाते
एक -दो नहीं ,सैकड़ों मीलो का,
सफर पैदल ही तय करने का
दृढ़ निश्चय मन में लिये,
जानते हैं ये भी ,बहुत मुश्किल है ये
कुछ भी रास्ते में, हो सकता है
पर ,अपने परिवार को सुरक्षित रखने का
मात्र यही, एक तरीका ,इनके पास रह गया है।
जिन आंखों में, चमक थी, एक साथ, कई उपग्रहों को
अंतरिक्ष में भेजते हुए देखने की‌।
वे ही छलक गई, ये दयनीय दशा देखकर ,मजदूरों की।
बहुत कड़वा सच है,
कि, ये जीवन इनका हैं, इन्हें ही जीना है
दुःख किसे बांटे,खुद ही सहना है
आज, बुरा वक्त है,
कल अच्छा भी आएगा।
पर, गरीबों का ये पसीना,
बेकार नही जाएगा। 12/05/20

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