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बंदिशें मंजूर नहीं....

Bhawna Nagaria
Bhawna Nagaria
30th Jun, 2020

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बंदिशों की बेडियों मे जकडी एक अबला थी वो नारी ,
अपने हर हक से अंजान ,अब तक उपेक्षित थी वो नारी,
पर आज मजबूर नहीं ,सबल हो गई है नारी
हर पलचुप्पी को तोड़ आज ,नयी पहल कर रही है नारी ।

माना लाज और शर्म मेरा गहना है ,
इससे मैंने कब अपना नाता तोडा़ है ,
पर बात जब मेरे सम्मान की आई ,
फिर मुझे भी तो कुछ कहना है ।

स्त्री धर्म निभाया था ,हर मर्यादा को भी माना था,
तुझसे जुड़ा हर रिश्ता मैंने, दिल से अपने निभाया था ,
सामाजिक जिम्मेदारी निभाना,अपना फर्ज माना था,
पितृसत्तात्मक इस समाज मे, अपना वजूद भुलाया था,
मकां को तेरे घर बनाकर,दहलीज को इसकी अपनी सीमा माना था ,
घर की चाहरदीवारी को भी ,कहाँ बंदिशें माना था..?

फिर इस जमाने ने इस चाहरदीवारी पर जाने क्यूँ....पहरा लगाया है..?
शायद अबला नारी जान, मुझे खुद से कमतर आँका है,
मेरी खामोशी को तुमने ,क्यों मेरी कमजोरी माना है ,
तुम नारी बिन सदा अधूरे हो ,क्यों नहीं ये स्वीकारा है ,
आत्मा को मेरी चोटिल कर,नारी शक्ति को ललकारा है।

अब नहीं है कोई खौफ हमें ,ना फिक्र कोई जमाने की है ,
कदम से कदम मिलाकर चलने की, आज मेरी पूरी तैयारी है।
बंदिशों मे रहना अब , फिर ना मुझे भाया है ,
डरना मेरी फितरत मे नहीं, ऐसा कुछ कर के दिखाना है ,
जल थल नभ सभी दिशाओं मे अपना परचम फहराना है,
यह नारी हुई आज सबला है,यही एहसास जमाने को कराना है,
आज है मुझमे आत्मविश्वास, लिखने को तत्पर हूँ एक नया इतिहास ,
दोहरी भूमिका निभा रही हूँ, अपने अस्तित्व का एहसास करा रही हूँ,
आज बेकरार हूँ विश्व पटल पर छा जाने को,अपनी अलग पहचान बनाने को।

बिताना चाहतीं हूँ कुछ लम्हे खुद के साथ ,
जहाँ सिर्फ मैं हूँ....और साथ हों मेरे एहसास....।

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