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दानवीर कर्ण

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Ashwin Sathye
30th Jun, 2020

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श्राप, अपमान, उपेक्षा जिसके अस्तित्व को हमेशा नोंचती रही वह सबसे शूर वीर और शानदार सेनानी था कर्ण। महाभारत जिन कुछ नामों की वजह से पहचानी जाती है उसमें से एक बहुत ही अदरणीय किरदार है कर्ण। दुनिया में अच्छे लोगों के साथ हमेशा अच्छा नहीं होता, अगर आप सौ अच्छी चीजों के साथ एक गलत चीज कर दो तो आपकी सारी अच्छाई मिट्टी में मिल जाती है, इसका जिता जागता उदाहरण है कर्ण। महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह के शरपंजर पर गिर जाने के बाद कौरवों की सेना का सेनानायक था कर्ण। और सब से बड़ी बात, अपनी बुआ कुंती का ज्येष्ठ पुत्र है यह जानकार भी कृष्ण ने हर बार अपनी धर्म की रक्षा की नीतियों को बरकरार रखने के लिए जिसका हर बार इस्तेमाल किया वो था कर्ण।

कर्ण की उपेक्षा उसके जन्म के साथ ही शुरू हुई थी। ऋषी दुर्वास ने कुंती को दिये आव्हान मंत्र से वो सूर्य से महज सोलह साल की उम्र गर्भवती रही। एक बिनब्याही लड़की का माँ बनना समाज नियमों से विपरीत था। उसने अपने आप को कमरे में कैद कर लिया और नौ मास पश्चात एक बड़े ही तेजस्वी बालक को जन्म दिया। उसके कान में मांस के सुनहरे कुंडल थे और छाती पर कवच था। ऐसे बच्चे को कौन त्यागना चाहेगा, अगर यह सब ना भी होता तो भी वो कुंती का अपना बेटा था। लेकिन अपने परिवार की गरिमा बनाए रखने के लिए उसने अपनी दासी धात्रि से कह कर उसे एक सन्दुक मे रखवा कर गंगा में बहा दिया। वो सन्दुक हस्तिनापुर के सारथी अधिराज को मिली। अंदर पाये बच्चे को उसने और उसकी पत्नी राधा ने अपनाया और उसका नाम रखा “कर्ण”। राधा के नाम से उसे “राधेय” भी कहा जाता है।

कर्ण में बचपन से ही महारथी बनने की प्रबल इच्छा थी। सूर्य की भांति उसके शरीर में बहुत ऊर्जा थी। लेकिन द्रोणाचार्य के शिविर में सब विद्यार्थी कर्ण की सुतपुत्र कह कर उपेक्षा करते थे जब की वो अर्जुन से अच्छा धनुर्धर और भीम से बढ़िया गदाधर था। द्रौपदी के स्वयंवर में भी उसने कर्ण की सुतपुत्र कह कर उपेक्षा की। कर्ण के माध्यम से हमे उस दौर में भी चलने वाले उच नीच का पता चलता है। कर्ण के मात्र सुतपुत्र होने की वजह से उसे कई सारी जगहों पर जाना और अपना हुनर दिखाना मना था। सिर्फ भीष्म पितामह और कृष्ण ही ऐसे थे जो कर्ण का लोहा मानते थे लेकिन वो भी खुल कर कभी बोल नहीं सके। कृष्ण जैसे कुटनीतिज्ञ ने तो जैसे अपनी सारी चालें सिर्फ कर्ण को हताहत करने के लिए ही सीखी थी। दुर्योधन जो अपने चचेरे भाई पांडवों से घृणा करता था, उसने पांडवों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कर्ण को अंगदेश का राजा बना दिया। दुर्योधन से मिले इस स्नेह का कर्ण ने हमेशा आदर किया और उसके हर अच्छे बुरे कांड में उसका साथ दिया। यही वो कारण था की दानवीर, तेजस्वी, महापराक्रमी होने के बावजूद कर्ण के सारे व्यक्तित्व को एक काली परत है।

कर्ण को तीन श्राप मिले थे और वो तीनों श्राप महाभारत के युद्ध में पूरे हुए। पहला था परशुराम से मिला हुआ। द्रोणाचार्य ने मना करने के बाद कर्ण ने अपने आप को ब्राह्मण बता कर परशुराम से ब्रह्मास्त्र की विद्या सीख ली। परशुराम को यह पता चलने पर उन्होने उसे श्राप दिया की जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। किसी भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे।

कर्ण जब शब्दभेदी विद्या सीख रहे थे तब अभ्यास के दौरान उन्होंने एक आवाज को ओर लक्ष्य बनाकर शब्दभेदी बाण चलाया जिसमें एक गाय का बछडा़ मारा गया। तब उस गाय-बछड़े के स्वामी ब्राह्मण ने कर्ण को शाप दे दिया कि एक दिन वह भी तब मारा जाएगा जब वह खुद को असहाय महसूस करेगा। फिर उन्हे श्राप मिला धरती से। एक लड़की को मिट्टी मे घुले घी को निचोड़ कर उसके घट में देते वक़्त धरती को दर्द होने लगा और उसने कर्ण को श्राप दिया की किसी निर्णायक युद्ध में वह भी उसके रथ के पहिए को वैसे ही पकड़ लेगी, जिससे वह उस युद्ध में अपने शत्रु के सामने असुरक्षित हो जाएगा।

इन श्रापों के अलावा कर्ण की दुर्गति में उन्होने दुर्योधन के साथ मिलकर किए कुकृत्य भी शामिल हैं। उन्होने द्रौपदी के चीरहरण में न सिर्फ हिस्सा लिया बल्कि उस याज्ञसेनी को “वेश्या” कह कर पुकारा। अभिमन्यु को चक्रव्युह में कौरवों ने घिरा तब कर्ण को पता नहीं था की अभिमन्यु उनका भतीजा है और उन्होने अभिमन्यु पर जानलेवा हमले किए। यह वही कांड है जो कृष्ण ने रचा था। उन्हे पता होने के बावजूद उन्होने किसी को कर्ण की सच्चाई नहीं बताई। और जब उन्होने देखा की कर्ण सब पर हावी हो सकता है तब उन्होने इंद्र से कह कर कर्ण के कवच और कुंडल निकलवा लिए जिससे उनका जन्मजात संरक्षण खतम हुआ। जब कर्ण के सारे श्रापों की वजह से कर्ण ब्रह्मास्त्र का मंत्र भूल गए और उनके रथ का पहिया जमीन में धस गया तब अर्जुन के रथ के सारथी बने कृष्ण ने अर्जुन को अभिमन्यु के मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए निहत्ते कर्ण पर ब्रह्मास्त्र चलाने के लिए कहा। और जब यह दानवीर वीरगति को प्राप्त हो गया तब उसकी सच्चाई सबको बता दी।

“व्यासोच्छिष्टम जगत् सर्वम्” यह पंक्ति कर्ण की दुर्गति के विषय में चिरकालिक साबित होती है। आज भी ऐसे लोग है जो बहुत मेहनती और जांबाज होने के बावजूद उन्हे वो सब नहीं मिलता जिसके वो हकदार है। कर्ण ज्येष्ठ कौंतेय था, युधिष्ठिर और दुर्योधन से बड़ा था। अगर उसके जन्म की सच्चाई छिपाई नहीं जाती तो कर्णही हस्तिनापुर नरेश बनता। लेकिन महर्षि व्यास ने महाभारत का निर्माण ही मनुष्य का जीवन कितना यातनाओं से भरा है यह दिखने के लिए किया था। और कर्ण इसका शिखर बनकर उभर आते हैं।

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Ashwin Sathye

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