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लोगों का काम है कहना

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Deepti Angrish M.
29th Jun, 2020

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कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...
यह पंक्तियाँ एक मशहूर गाने की है यह आप सब जानते ही हैं। कई साल बीत गए इस गाने को लेकिन इसमे बताई हुई “लोग क्या कहेंगे” यह सच्चाई अब भी समाज मौजूद है और न जाने कितने ज़िंदगियों को या तो घुट घुट कर जीने के लिए मजबूर कर रही है या पूरी तरह से तबाह कर रही है।

क्या हम जिंदगी में जो कुछ भी करते हैं वो सब दूसरों की खुशी के लिए करते हैं? कई चीजों का तो दूसरों से कुछ लेना देना भी नहीं होता। फिर भी हम उनके बारे में सोचते हैं। ऐसा क्यूँ? कई बार बात प्रतिष्ठा की होती है। हाँ, हमारे घर परिवार पर कोई उंगली ना उठाए इसकी ज़िम्मेदारी हम पर होती है, कई सारी बाते हमे बहुत ज्यादा सावधानी से करनी होती है जिससे हमारे परिवार की गरिमा बनी रहे। लेकिन यह बात निजी होती है। इसमें लोग और समाज को घुसेड़ने की जरूरत नहीं होती।

इस बेतुकी बातों में सबसे ऊपर नंबर लगता है हमारी जाती प्रथा का। एक तरफ तो हम हमारे देश के अनेकता में एकता का पूरी दुनिया के सामने ढिंढोरा पीटते है। लेकिन यह एकता कितनी खोखली है इसका पता तब चलता है जब दो अलग अलग जाती या धर्म के युवक युवती आपस में प्यार करते हैं और एक दूसरे के साथ शादी करना चाहते हैं। तब विविधता के अभिमान का कीड़ा किसी कोने बिलबिलाता छोड़ दिया जाता है और दुराभिमान का साँप दिमाग की गठड़ी से बाहर निकाल कर उन दो मासूमों पर छोड़ दिया जाता है। ऑनर के नाम पर अपने समुदाय, जाती या धर्म के ना होने वाले लड़के या लड़की का बेरहमी से कत्ल किया जाता है? कभी कभी तो अपने ऑनर के चक्कर में अपने खून के बच्चे को भी खून से सना दिया जाता है? यह कैसा ऑनर है? और इसके पीछे कारण क्या, तो वो ही, “लोग क्या कहेंगे?”
अब दूसरी बात तो काफी मजेदार है। घर परिवार में किसी की शाही शादी हो रही हो तो उसे तोहफा कम से पाँच हजार का तो देना ही चाहिए, वर्ना? वर्ना, लोग क्या कहेंगे भाई। मुझे तो इतना तोहफा देना ही पड़ेगा भैया, फिर मेरी औकात हो या ना हो।

“लोग क्या कहेंगे” का सारा मामला प्रतिष्ठा से ही जुड़ा होता है। फिर आपको मुंबई जैसे शहर में घर खरीदना हो, किसी कंपनी में नौकरी करनी हो, किसी बड़े से स्कूल कॉलेज में बच्चों के ऍडमिशन कराना हो, इतना ही नहीं, छूटियों में बच्चों को किसी दूर के हिल स्टेशन पर हवाई जहाज से ले जाना हो या विदेश जाना हो, इस सब में सवाल बच्चों के भविष्य, उनकी और अपनी खुशी या अपनी सहूलियत का कम और प्रतिष्ठा का ज्यादा होता है। आजकल शादी के बाद वधू वर अगर हनीमून पर जाते है तो वो भी प्रतिष्ठा के लिए। और अगर कोई नहीं जा पाते वो हो जाते है बेचारे...

अब यह विचार इतने सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी किसी परंपरा की तरह समाज में पनपता रहता है। बच्चे बचपन से जो देखते, सुनते हैं वही सच मानते हैं। उनके पास वो खिलौना ना हो जो पड़ोस के बंटी के पास है तो उसकी प्रतिष्ठा को ठेंस पहुँचती है। ऐसे वक़्त में उसके माता पिता उसे समझने का वह मौका गँवाते हैं। बड़ा होने के बाद बेटा आयफोन, रॉयल एनफ़िल्ड मांगने लगता है और बिटिया एपल का लैपटाप। अब तकनीकी ने इतना काम तो कर ही दिया है की हर गजेट के नए नए वर्जन निकालो और बच्चों में पनपा प्रतिष्ठा का भूत माता पिता के सर पर बिठा दो। इसमें बच्चों का तर्क भी यही रहता है की अगर उनके पास वो चीज नहीं आएगी तो दोस्त उसके माता पिता की क्षमता को ही कोसेंगे। मरते क्या ना करते। पिताजी अपनी प्रतिष्ठा रखने के लिए दे देते है जो बच्चे मांगे।

शादी के बाद किसी जोड़े को बच्चा होने में दिक्कत होना भी प्रतिष्ठा का विषय होता है। पहले तो बेटा चाहिए की रट लगाते है और अगर कई साल बीत जाने के बाद भी बहू की गोद नहीं भरती और जब लोग बोलने लगते है तब “एक बेटी भी चलेगी” ऐसे कहने वाले यह दोगले लोग होते है।

“लोग क्या कहेंगे” यह एक न्यूनगंड या इन्फेरिओरिटी कॉम्प्लेक्स का एक नमूना है और यह सामाजिक बीमारी है ऐसा मैं मानती हूँ। यह कॉम्प्लेक्स जिसे हो जाता है वो अगर पैसे वाला या किसी भी तरह से सक्षम, सशक्त है तो वो उसे पूरा कर सकता है। बात तो उनकी है जो यह नहीं कर सकते। जो पहले ही अभाव में रहते है उनके लिए “लोगों के मुताबिक चलना” भी एक लक्जरी होती है। अगर वो इन बातों को नहीं मानते तो ही वो इससे उभर सकते हैं। और जो नहीं उभर सकते वो इस कॉम्प्लेक्स का शिकार होते है। कई लोग जिंदगीभर के लिए एक मानसिक कोष में चले जाते हैं तो कुछ यह बोज सहन न कर पाने की वजह से अपने आप को खतम कर देते हैं। कई जगह बच्चा ना होने वाली औरत को कार्यक्रमों में बुलाया नहीं जाता, क्यूँकी, लोग क्या कहेंगे।

यहाँ एक बात समझ लेनी बहुत जरूरी है की कम ज्यादा आर्थिक, सामाजिक अवस्था से हम सब गुजरते हैं, सभी एक ही तरह के विचार रखते हैं, एक ही तरह से दूसरों से अपेक्षा रखते हैं। ऐसा होने के बावजूद हम एक दूसरे को समझते क्यूँ नहीं? सभी एक दूसरे से बस डरते रहते है, क्यूँ? आपकी बेटी को किसी दूसरे धर्म के लड़के से प्यार हुआ तो हुआ, अब कब तक यह तकयानूसी बातों को दिलसे लगा कर बैठेंगे? जो बात अपने बेटी या बेटे की वही किसी दूसरे के बच्चों के बारे में भी होनी चाहिए ना। जो बात अपने परिवार की वही दूसरों के परिवार की भी होनी चाहिए ना? खुले दिल से उस हर चीज का हम स्वागत और अभिनंदन क्यूँ नहीं कर पाते? क्या यह इतना जटिल है? सकारात्मक दृष्टि की ही तो बात है। जो मेरे बस की बात नहीं वो मैं सिर्फ लोग क्या कहेंगे इसके डर से नहीं करूंगा और ना ही दूसरों को करने दूंगा यह विचार सब लोगों को एक पलड़े में ला रखता है, ना कोई किसी से उंच है और ना नीच। एक दूसरे के प्रति अगर हम सन्मान और आदर रखेंगे तब ही यह बिन मतलब की “लोग क्या कहेंगे” वाली सोच छू मंतर हो जाएगी।

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Deepti Angrish M.

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