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हम कठपुतली

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29th Jun, 2020

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हम कठपुतली

बचपन मृदुल, कोमलंगी होता,
और जवानी मद में चूर।
जीवन की तृष्णा नहीं मिटती,
चाहे जी ले तू भरपूर।
और बुढ़ापे की सलवट में,
हो जाता इतना मजबूर।
एक ऐसा जीवन बनवाया,
जिसमें केवल है दस्तूर।
समय निराला कोमल काया,
हो जाती है सब काफूर।
जब बसंत का स्वागत होता,
पतझड़ से फिर हम क्यों दूर।
जो मिला जैसा मिल पाया,
उस समय में आनंद भरपूर।
तेरा मेरा क्यों फिर इसमें,
हम सब तो है बस मजदूर।
कठपुतली हम है रंगमंच की,
बेमतलब में है मगरूर।

(प्रफुल्ल चन्द्र मठपाल)


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