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प्रेम की परिभाषा

Anita pathak
Anita pathak
27th Jun, 2020

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प्रेम! ये कभी भी स्वार्थी नही होता और जहाँ स्वार्थ, मतलब, शर्त , आ जाए वो प्रेम नहीं होता।

प्रेम की परिभाषा .....❤❤

क्या है प्रेम?
कुछ कहते हैं कि प्रेम
" दर्द है " कुछ कहते " खुशी है" , कुछ कहते " खोने का नाम है प्रेम" , कुछ कहते "पाना है प्रेम" कुछ के लिए प्रेम " त्याग है, बलिदान है, समर्पण है प्रेम" तो वहीं कुछ के लिए " अधिकार, भाव और जताना है प्रेम"।
प्रेम का कोई भी रूप हो पर वो तभी तक प्रेम बना रहता है जब तक उसमें अधिकार भी मनूहार और प्यार से भरा हो। "मालिकाना" (possessiveness) बनते ही शायद प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं रहता ।

वैसे मेरी नज़र में प्रेम सिर्फ एक "एहसास " है। एहसास में वो ताकत होती है जो दो साथ बैठे लोगों को भी 'दूर' कर देता है वहीं दूर बैठों को भी 'पास' कर देता है।
Possessiveness एक तरह की ऐसी "अति" होती है जो हमें सिर्फ वही सोचने और समझने पर मजबूर करता है, जो हम actually सोचना और समझना चाहते हैं।

कई बार एक " माँ " को अपने बच्चे के प्रति possessive होने की संज्ञा दी जाती है। ये कुछ हद तक सही भी है क्योंकि एक माँ अपने बच्चे के लिए किसी हद तक जा सकती है। संकट पड़ने पर किसी को मार सकती है, खुद को मरने दे सकती है। पर यहाँ भी यह शब्द पूर्णतः सही नहीं है। एक माँ की ये हरकत भी संकट पड़ने पर ही उजागर होती है अन्यथा उसका अपने बच्चे के प्रति प्रेम पूर्णतः प्रेम ही रहता है।

भाई-बहन हों, दोस्त- यार हों कोई भी हों। प्रेम जब सुरक्षा, त्याग, और अपनत्व लिए हो तभी वह अपने सरल व स्पष्ट रूप में होता है। जहाँ अधिकार है वहाँ भी सच्चा प्रेम है क्योंकि अधिकार उसी पर होता है जिससे प्रेम होता है। परंतु जहाँ "अति" है वहाँ थोड़ा स्थिर होकर सोचने और समझने की ज़रूरत है।

बात यदि पति - पत्नी के बीच की हो तो वहाँ भी समर्पण और ईमानदारी ही प्रेम का रूप हो सकता है।
प्रेम सुरक्षात्मक हो सकता है परंतु आक्रामक नहीं। यदि पुरूष किसी संकट में आ जाए तो स्त्री अपनी महत्वकांक्षाएँ और अभिलाषाओं को त्यागकर उसके संकट में साथ रहे। उसके लिए समर्पित रहे और अपने सहारे की सुरक्षा का एहसास कराए । वैसे ही यदि
औरत को कष्ट हो या उस पर कोई विपत्ती आ जाएशतो पुरूष एक मज़बूत खंभे की तरह उसके सामने खड़ा हो।
हमेशा प्यार - और समर्पण की बात करने वाला पुरूष या औरत भी यदि समय पर एक - दूसरे की उम्मीदों पर ख़रे नहीं उतरते तो उस प्रेम का कोई औचित्य नहीं।
कई बार असीम प्रेम होते हुए भी सिर्फ छोटी सी नासमझी या गलतफ़हमी भी उनके बीच की दूरी का कारण बन सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण " प्रेम सिर्फ प्रेम होता है, बिना किसी शर्त , बिना किसी परीक्षा, बिना किसी सफाई के। प्रेम उतना ही निर्मल और पवित्र है जितना स्वंय सृष्टि के रचनाकार । " माता - पिता, भाई - बहन, पति-पत्नि इनमें से हर रिश्ता तब तक ही सुंदर और स्नेहमयी है जबतक यहाँ प्रेम सिर्फ प्रेम के रूप में मौजूद है, दूसरा कोई भी रूप लेते ही इसका मूल रूप थोड़ा तो प्रभावित होता ही है।"
( स्वरचित मौलिक अधिकार सुरक्षित )
अनिता पाठक
2nd August 2018
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