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अनकहा प्यार

vijay saini
vijay saini
26th Jun, 2020

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लफ्जों की सीमाओं से परे दायरे में किसी के ना रहे
नजरों के मचलने, पलकों के गिरने होठों के लरजने काबू ना रहे
देख कर उसे धड़कनों पर काबू ना रहे
रोम रोम खिल उठे एक भी कतरा बाकी ना रहे
हां प्यार को जतलाने में कोई हानि नहीं
पर अनकहे प्यार को समझ जाए उसकी कोई सानी नहीं
अनकहा प्यार है जमीन के अंदर बोए हुए बीज जैसा
ना जाने उसके प्यार का पौधा उगेगा कैसा
अनकहा प्यार है फूलों की एक बंद कली जैसा
खुलने पर उसके ना जाने रंग दिखलाएं कैसा
अनकहा प्यार है रेगिस्तान की मरीचिका जैसा
अगर जतला ना पाए तो मुट्ठी में बंद पड़ी रेत जैसा
अनकहा प्यार है साज में बंद एक धुन के जैसा
निकले जब बाहर बन जाए न जाने तराना कैसा
अनकहा प्यार है आसमान में फिरते आवारा बादल जैसा
बरस जाए तो ना जाने बना दे प्यार का सागर कैसा
अनकहा प्यार है बंद पड़ी एक किताब जैसा
पलट जाए पन्ने तो लिख देना जाने अफसाना कैसा

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