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अंतहीन

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Sarika Srivastava
25th Jun, 2020

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यूं तो एक दिन ऐसा ही था होना, प्रकृति को स्वयं ही आकर खुद को था बचाना।

कहा हमसे की वृक्ष लगाओ,
पशु पक्षी को कभी न खाओ,

धैर्य रखना, अति उत्साहित ना होना,
ऊर्जा का करना उपयोग सही,
उड़ना खुलकर, सीमा में रहना राह कभी भटकना नहीं,

गुरुत्वाकर्षण हो न्यूटन का
या रामायण हो तुलसी की, सफलता सबको वहीं मिली जहां छाव थी पेड़ पौधों की

सूखा, बाढ़, सैलाब के रूप में कई बार हमें सचेत किया,
भूल गए हम उस प्रकृति को जिससे हमने जनम लिया

सब्र टूट गया प्रकृति का जब,
तब कहे का रोना
विनाश का कारण बन गया एक छोटा विषाणु कोरोना

क्षमा करो है प्रकृति हमें अब और नहीं है रोना,
इस कहर से हमें बचाओ,नष्ट करो कोरोना, नष्ट करो कोरोना ।


सारिका 'अतुलित गंगा'

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