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Shailendra kumar verma
Shailendra kumar verma
25th Jun, 2020

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मेरा काम बहुत दिनो से बंद पड़ा हे विनोद ये बात फुसफुसा कर अपनी पत्नी मीरा से कह रहा था। ना जाने कब तक ये करोना का झंझट चलता रहेगा सरकार भी तो लोकडाऊन पर लोकडाऊन लगाए जा रही है, मीरा--सरकार भी क्या करें बिमारी भी तो एसी है। विनोद--हाँ पर हम रोज कमाने खाने वालो का क्या होगा। मीरा--अरे !विनोद तुम चिंता मत करो कुछ न कुछ इंतजाम हो जाएगा। सुबह अचानक विनोद कि नींद खुलती है।अरे मीरा इतनी सुब्ह अभी तो साड़े पाँच ही बजे हे ओर कई दिनो से बंद ये सीलाई मशीन क्यो बाहर निकाल के साफ कर रही हो। मै सोच रही हुँ क्यो ना हम जब तक करोना महामारी फैली हे कपड़ो के मास्क बनाकर सस्ते दामो मे बैचते हे जिस्से लोगो का भी भला होगा ओर हमारा जीवन यापन भी जैसे तैसे चल जाएगा। विनोद-- हाँ बात तो तुम्हारी सही हे मीरा दिन रात मास्क बनाती हे घर के बाहर तख्ती पर महावर के रंग से लिखकर लगा देती हे यहाँ कपड़े के मास्क सस्ते दामो पर मिलते है। धिरे -धिरज सबको मोहल्ले मे पता चल जाता हे मीरा के बनाए मास्क आसपास सभी गली मोहल्ले वाले खरिदते हे ओर लगाकर रखने से करोना के संक्रमण से बचे रहते है। उधर विनोद को पैपर मे सेनेटाईजर कंपनी मे सांयकल पर सेनेटाईज़र विक्रय करने वाले व्यक्ती की आवश्यकता हे । ख़बर पढ़ने को मिलती हे विनोद तुरंत नम्बर पर फोन लगाता है। कंपनी से हाँ मै जवाब सुनकर विनोद खुशी से मीरा को बताता है। अगले दिन से मास्क पहनकर विनोद भघ सेनेटाईज़र की बौतल लेकर घर-घर बैचकर दिनचर्या चलाने लगता है। आपसी सामजंस्य से दोनो मिलकर परिवार को बुरे समय से उबार लेते है आज ख़बर आई हे लोकडाऊन खुल गया है। विनोद खाने का टिफीन लेकर फैक्ट्री को फिर से रवाना हो गया खुशी-खुशी।
✍शैलेन्द्"उज्जैनी"

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