Bluepadमलाला : ज्ञान की जांबाज उपासक
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मलाला : ज्ञान की जांबाज उपासक

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Shubham Yadav
30th Nov, 2021

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वो एक शेरनी है। शेरनी जिसने पाकिस्तान के स्वात प्रांत की असीम कुदरती खूबसूरती को तहस नहस करने वाले, जंगल राज मचाने वाले तालिबानियों से पंगा लिया। महज १५ साल की उम्र में उनके बंदूक से निकली गोली को झेला। उससे भी उभर कर आई और १७ की उम्र में नोबल पुरस्कार जीता। वो मशहूर और आदर्श नाम है मलाला युसुफ़जई। “शिक्षा यह शेरनी का दूध है, जो इसे पिता है वो बिना दहेड़े नहीं रहता।” डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर के यह शब्द पूरे करते हुए मलाला ने १९ जून २०२० को ही ब्रिटेन के प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र (फिलॉसफी, पॉलिटिक्स और इकोनॉमिक्स) में अपनी स्नातक डिग्री प्राप्त की है।

अपने बेहतरीन कार्य की वजह से १५ साल की उम्र में तालिबनियों के गुस्से का सामना करने वाली मलाला की हत्या करने की साजिश रची गई थी। ९ अक्तूबर २०१२ को जब वो अपने स्कूल से बस में लौट रही थी तब उसपर तीन गोलियां बरसाई गई। एक गोली उसकी आँखों में लगकर उनके कॉर्निया को छेद कर निकल गई और उनकी रीड की हड्डी के शीर्ष पर जा बैठी। मलाला के साथ उनकी दो दोस्त केनत रियाज और शाझिया रमज़ान भी ज़ख्मी हुई। मलाला पर पेशावर के सैनिकी अस्पताल में इलाज शुरू किया गया। पूरे पाँच घंटे की सर्जरी के बाद गोली निकली गई। लेकिन इसमें उनके मस्तिष्क का एक हिस्सा निकालना पड़ा। अभी उन्हे इन्फेक्शन का खतरा बरकरार था और गोली की वजह से सिर के कई हिस्सों को नुकसान पहुंचा था। इसलिए पाकिस्तान सरकार के परामर्श से उन्हे इंग्लंड के बर्मिंगहॅम के क्वीन एलिझाबेथ अस्पताल में ले जाया गया जहां जवानों पर इलाज किया जाता है। यहाँ इलाज होने के बाद मलाला जैसे अग्निशिखा की तरह चमक उठी और उन्होने ऐलान किया की जिस काम की वजह से उनपर यह निहायती कायराना हमला किया गया है वो लड़कियों और औरतों को शिक्षा देने का काम वो आगे भी करती रहेगी।

मलाला का जन्म १२ जुलाई १९९७ में पाकिस्तान के खैबर पख्‍तूनख्‍वाह प्रांत के स्वात जिले के मंगोरा में हुआ। उनके पिता जियाउद्दीन युसुफझाई यह एक कवी है और वहाँ अपने एक बेटे के नाम से ‘खुशाल पब्लिक स्कूल’ यह निजी स्कूल चलाते हैं। मलाला बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहती थी लेकिन उनके पिता उन्हे राजनीति में लाना चाहते थे। शायद उन्हे तब पाकिस्तान को एक अच्छे और जांबाज नेता की आवश्यकता प्रतीत हुई हो। ऐसे पिता और माता तोर पेकाई के समर्थन से मलाला पाकिस्तान में लड़कियों, औरतों और अन्य पीड़ितों की शिक्षा और बाकी अधिकारों के लिए काम करने लगी। २००८ में उनके पिता ने उन्हे तालिबानियों के खिलाफ बोलने के लिए प्रोत्साहित किया और महज ११ साल के मलाला को वो पेशावर ले गए जहां उन्होंने नेशनल प्रेस के सामने वो मशहूर भाषण दिया जिसका शीर्षक था- “मेरा शिक्षा का अधिकार छीन लेने की इन तालिबानियों की हिम्मत कैसे हुई?” राष्ट्रिय अखबारों में छपी इस खबर ने मलाला को लोकप्रिय कर दिया। उन्हे कई सारे संस्थानों से संवाद के लिए बुलावे आने लगे। सन २००९ में, १२ साल की उम्र में पाकिस्तान की “इन्स्टिट्यूट फॉर वॉर अँड पीस” के 'ओपन माइंड्स' कार्यक्रम में उन्होने हिस्सा लिया जहां पाकिस्तान के युवाजन समाज की समस्याओं पर चर्चा और तर्क-वितर्क करते हैं।

इसी दौरान मलाला ने “गूल मकई” नाम से बीबीसी ऊर्दू के ब्लॉग पर एक डायरी लिखना शुरू किया। वो इसमें तालिबानियों के जुर्मो सितम का सारा कच्चा चिट्ठा खोल देती थी। वो बताती थी कि कैसे लड़कियों और औरतों की पढ़ाई पर रोक लगा दी गई है, उन्हे ना टीवी देखने की आज़ादी है और ना ही खेलने कूदने की। वो बताती थी कि किस तरह से स्वात प्रांत के लोगों की रोज मर्रा की जिंदगी पर तालिबानियों ने पाबंदियों के पहाड़ लाद दिये है। उनके लेखों से बाहरी दुनिया को स्वात के अंदर चल रहे ना-इंसफ़ियों के बारे में पता चला। इतना ही नहीं, पख्तून लोग भी अपने साथ हो रहे अन्याय से आग बबूला हो उठे जो वो २००७ से झेल रहे थे।
मलाला के इस पहल के लिए उन्हे २०११ में पाकिस्तान का राष्ट्रीय युवा शांती पुरस्कार देकर सन्मानित किया गया। शायद यही बात तालिबानियों के आँखों में खल रही थी। उन्होने मलाला को अपना काम रोकने के लिए धमकियाँ देना शुरू किया। लेकिन वो ऐसे गीधड़ भमकियों से डरने वाली नहीं थी। आखिर ९ अक्तूबर २०१२ को तालिबानियों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया और मलाला पर तीन गोलियां बरसाई। लेकिन तब तक मलाला एक आंतरराष्ट्रीय फिगर बन चुकी थी। उसके बाद तालिबानियों को अपना बोज़ा बिस्तरा समेट कर वहाँ से नौ दो ग्यारह होना पड़ा।

१० अक्तूबर २०१४ को मलाला को नोबेल शांतता पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। उन्हे यह पुरस्कार भारता के कैलाश सत्यार्थी के साथ दिया गया। १७ साल की उम्र में नोबेल पुरस्कार मिलने वाली वो आज तक की एक मात्र युवा लड़की है। उन्होने ख्रिस्तिना लँब के साथ मिलकर ‘आय एम मलाला : द गर्ल हू स्टुड अप फॉर एज्युकेशन अँड वॉज शॉट बाय द तालिबान’ यह अपनी कहानी बयान करने वाली किताब लिखी है। अपने छोटे से जीवन में अब तक करीब ३० पुरस्कार प्राप्त करने वाली मलाला तेईस साल की उम्र में ही समाज में होने वाले अत्याचारों को सामने लाने की इच्छा रखने वाले हर एक के लिए आदर्श बन चुकी है। “एक औरत यदि पढ़ लिख जाए तो सारा समाज साक्षर बनाता है,” यह बताने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले के पदचिन्हों पर चलने वाली मलाला भी कहती है, “जिन्हे पढ़ी लिखी औरतों से डर लगता है उन्हे दरअसल ज्ञान की शक्ति से डर लगता है।“ १२ जुलाई को चोबिस वे साल में कदम रखने वाली मलाला को अपना कार्य बढ़ाने के लिए शुभकामना व्यक्त करते हैं।

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