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निरन्तरता का पथ।

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Nitesh kumbhkar
23rd Jun, 2020

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सुख कर पतझड़ की राहों में पड़ा हूँ ले बवंडर की हवाओ को अडा हूँ एक मूरत को बनाने में बिगड़ कर फिर चला हूँ हूँ पथिक भेदी शिला का रक्त मड़ने में चला हूँ हूँ माटी का पुलिंदा,ज्वलित सी घटाओ में तपकर निखरने में चला हूँ एक मूरत को बनाने में बिगड़ कर फिर चला हूँ वही पुराना एकलव्य हूँ चाहे अंगूठा मोड़ दे में रुकूँगा उस डगर जंहा सांस दामन छोड़ दे ये कर्मभूमि युद्ध को आतुर लहू अब मांगती ये राह नही आसान स्वप्नों को सजाना छोड़ दे ले कलम हाथों में कि अब गिरना सम्भलना छोड़ दे अब रुकूँगा उस डगर जहाँ सांस दामन छोड़ दे अब रुकूँगा उस डगर जहाँ सांस दामन छोड़ दे ।

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Nitesh kumbhkar

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