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बाबा साहेब अंबेडकर ..

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23rd Jun, 2020

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स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री डा. भीमराव अंबेडकर की पहचान मात्र इतनी हीं नहीं है। भारतीय संविधान के निर्माता, समाज सुधारक और महान नेता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भारत में हीं नहीं बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। बाबा साहेब के नाम से मशहूर भारत रत्न अंबेडकर जीवन भर समानता के लिए संघर्ष करते रहे। इसलिए उनके जन्मदिन को भारत में समानता दिवस और ज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। भीमराव अंबेडकर के जन्मदिन पर 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती मनाई जाती है। आज हम भीमराव अंबेडकर के बारे में जानते हैं।
पारिवारिक परिचय - बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव महू में हुआ था। हालांकि उनका परिवार मराठी था और मूल रूप से महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के आंबडवे गांव से था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और मां भीमाबाई थीं। अंबेडकर महार जाति के थे। इस जाति के लोगों को समाज में अछूत माना जाता था और उनके साथ भेदभाव किया जाता था। उन्हें प्रारंभिक शिक्षा लेने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अंबेडकर का उपनाम उनके गांव के नाम आंबडवेकर लिखवाया गया था। जो कि बाद में अंबेडकर कर दिया गया।

शैक्षणिक परिचय - भीमराव बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने मुंबई से बैचलर ऑफ आर्ट्स (बीए) की शिक्षा पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए वे 1913 में अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए किया गया। यहां उन्होंने राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। 1916 में उन्हें एक शोध के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया। अंबेडकर लंदन से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट करना चाहते थे लेकिन स्कॉलरशपि खत्म हो जाने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और वे वापस भारत आए। भारत आने के बाद उनकी नियुक्ति मुंबई के सिडनेम कॉलेज में प्रोफेसर पर हुई। 1923 में उन्होंने श्ज्ीम च्तवइसमउ व िजीम त्नचममश् नाम से अपना शोध पूरा किया। इसके बाद लंदन यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टर्स ऑफ साइंस की उपाधि दी। भारत में उन्होंने बॉम्बे के उच्च न्यायालयों में अपनी वकालत शुरू की।
राजनीतिक परिचय - डॉक्टर भीमराव अंबेडकर समाज में दलित वर्ग को समानता दिलाने के जीवन भर संघर्ष करते रहे। अंबेडकर ने 1936 में स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की। इसके अगले वर्ष 1937 में केंद्रीय विधानसभा चुनावों में लेबर पार्टी को 15 सीटें मिली। महात्मा गांधी द्वारा दलित समुदाय को हरिजन कहकर बुलाने पर अंबेडकर की उनसे कहासुनी भी हुई। कांगे्रस और गांधी से मतभेद के बावजूद अंबेडकर को स्वतंत्र भारत का पहला कानून मंत्री बनाया गया। 29 अगस्त 1947 को अंबेडकर को भारत के संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। भारतीय संविधान बनाने में बाबा साहेब के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। बाबासाहेब अंबेडकर ने 1952 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वो हार गए। मार्च 1952 में उन्हें राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और फिर अपनी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

मृत्यु से कुछ समय पूर्व अंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु महत्थवीर चंद्रमणी से पारंपरिक तरीके से बौद्ध धर्म को अपना लिया। 6 दिसंबर 1956 को अंबेडकर ने दिल्ली में अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार मुंबई में बौद्ध रीतिरिवाज से कर दिया गया।

डाॅक्टर भीमराव अंबेडकर को पढ़ने और लिखने में काफी लगाव था। उन्होंने कई किताबें भी लिखंी। जैसे- ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ और ‘वॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ इत्यादि पुस्तक लिखी थी। अंबेडकर की आखिरी किताब ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ थी। उनकी यह किताब अंबेडकर की मृत्यु से तीन दिन पूर्व पूरी हुई थी। उन्होंने ‘जाति के विनाश‘ पर भी एक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने जाति, वर्ग, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव के गंभीर प्रभावो के विषय में चर्चा की। उन्होंने सामाजिक कार्य करने के साथ-साथ लोगों को शिक्षा का महत्व भी समझाया। लोगों को अपने अधिकारों के प्रति लड़ने के लिए और जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए प्रेरित किया। सामाजिक कार्य में उनकी सक्रिय भागीदारी के कारण लोगों ने उन्हें ‘बाबासाहेब’ के नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया।

डा.अंबेडकर के विचार हमेशा से ऊंचे रहे। उनका कहना था कि जीवन लंबा होने के बजाय महान होना चाहिए। बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। डा. अंबेडकर ऐसे धर्म को मानते थे जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है।

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