Bluepadएक गीत ऐसा भी
Bluepad

एक गीत ऐसा भी

R
Rakesh Berwal
20th Jun, 2020

Share

गीत जो कोई छेड़ना चाहा तो, लफ्ज़ कम पड़ गए!
मुस्कुराए कुछ इस तरह हम अपने दर्द पर, यह देखकर आंसू भी नम पड़ गए!
उनके लगाए पेड़ कैसे हरे हो गए,
मेरे हाथ लगाने से तो पत्ते भी झड़ गए! बच ना सके यहां वक्त की मार से दौलत वाले भी, काम ना आ सके वह कमाए हुए पैसे भी सड़ गए!
कितनों को खा गई यह लंबी लंबी सड़कें,
कुछ परिंदे ही बेचारे सुरक्षित अपने घर गए!
बहुत कम बचे हैं जिनका जमीर जिंदा है,
पर कदम कदम पर मिलेंगे जो अंदर से मर गए!
गुलाम है आदमी यहां अपनी ही छोटी सोच का,
जो काटा इन बेड़ियों को वह तो दुनिया से तर गए!
अब ना दो राकेश को नसीहते अपनी,
अरे हम तो बहुत पहले ही सुधर गए!

9 

Share


R
Written by
Rakesh Berwal

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad