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बेवफाई ....
कविता हेच माझे जग .
कविता हेच माझे जग .
17th Jan, 2023

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बदल जाना तो यहीं तुम्हारी आदत जो थी
दुर चले जाना था तो बहाने जरुरत क्या थी
कह देती हमे तुम्हारे जिदगी कोई और है
तो मेर पवित्र रिश्ते को बदनाम करने की
जरुरत क्या थी ...बस एक बार अजमा लेती .
जाने देते तुम को भी वफा कर लेता मै
बेवफाई की जरुरत क्या थी
दो कदम साथ निभाने थे
तो उम्रभर के लिए मेरा हात
पकडणे की जरूरत क्या थी
हमे बदल ना सके तुम हमे
यहीं तो तुम्हारी हम मुसीबत थी
इतनी नफरत हो गयी थी
हमसे जहर देकर मार देती थी
उम्रभर तडपाने की जरूरत क्या थी
गम हमे तेरे बदसलुकी का नहीं करते हम
हमने की जो भुल नहीं की हमे उसकी सजा देने की
जरुरत क्या थी ...तुम आये मेरे जिदगीमें
मुझपर फिदा होने ऐसी जरुरत ही क्या थी
झुठा प्यार करने की तुम्हे जरूरत क्या थी
मेरा दिल है मना लुगा मै वक्त साथ बदलकर
हम जीयेगे किस्मत को साथ लेकर
तुम खुश कैसी रहोंगी किसीको धोका देकर

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