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दुश्मनों के लिए चट्टान थे ‘छत्रपति’

Shreyansh Jain
Shreyansh Jain
19th Jun, 2020

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मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज दुश्मनों के लिए तो चट्टान थे लेकिन दोस्तों के लिए वे दयालु थे। वे दुश्मनों से भी दयालुता का भाव रखते थे। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी वीरता से मुगलों को घुटने टेकने तक पर मजबूर कर दिया। अष्टप्रधान मंडल की स्थापना के दौरान हुए समारोह में शिवाजी को छत्रपति की उपाधि दी गई थी। इनके शासनकाल में मराठी तथा संस्कृत भाषा के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया।

छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम शिवाजी भोंसले भी है। शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने भगवान शिव के नाम पर उनका नाम शिवाय रखा। इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें था। शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास है। शिवाजी को हिन्दूओं का नायक भी माना जाता है। शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे। धार्मिक कार्य में उनकी काफी रूचि थी। रामायण और महाभारत का अभ्यास वह बड़े ध्यान से करते थे।

शिवाजी के पिताजी शाहजी भोंसले एक मराठा सेनापति थे, जो कि डेक्कन सल्तनत के लिए काम किया करते थे। शिवाजी की माँ बचपन से ही  शिवाजी को युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं के बारे में बताती रहती थी। विशे षतौर पर रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाती थी। धार्मिक कार्य में उनकी काफी रूचि थी।

शिवाजी महाराज का विवाह 14 मई 1640 में सईबाई निम्बलाकर के साथ लाल महल, पूना (पुणे) में हुआ था। शिवाजी न सिर्फ एक महान शासक थे बल्कि दयालु योद्धा भी थे। शिवाजी एक सेक्युलर शासक थेे। वह जबरन धर्मांतरण के सख्त खिलाफ थे। उनकी सेना में मुस्लिम बड़े पद पर मौजूद थे। वह एक धार्मिक हिंदू के साथ दूसरे धर्मों का भी सम्मान करते थे। वो संस्कृत और हिंदू राजनीतिक परंपराओं का विस्तार चाहते थे। उनकी अदालत में पारसी की जगह मराठी का इस्तेमाल किया जाने लगा। ब्रिटिश इतिहासकारों ने उन्हें लुटेरे की संज्ञा दी लेकिन दूसरे स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका को महान हिंदू शासक के तौर पर दिखाया गया। परंतु उन्हें मुगलों  की अधीनता स्वीकार्य नहीं थी। शिवाजी ने आदिलशाही सल्तनत की अधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे कई लड़ाईयां की थी। शिवाजी को हिन्दूओं का नायक भी माना जाता है। शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे।

उनकी सेना पहली ऐसी थी जिसमें गुरिल्ला युद्ध का जमकर इस्तेमाल किया गया। जमीनी युद्ध में शिवाजी को महारत हासिल थी, जिसका फायदा उन्हें दुश्मनों से लड़ने में मिला। पेशेवर सेना तैयार करने वाले वो पहले शासक थे। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया। इसका कारण बताया जाता है कि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे। ब्राहमणों ने श्विाजी से क्षत्रियता का प्रमाण लाने के बाद राज्यभिषेक करने की बात कही। इसको लेकर  बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे जिसके बाद वर्ष 1674 में रायगढ़ में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ ।

परंतु अभी भी उनकी परेशानी खत्म नहीं हुई थी। राज्याभिषेक के बाद भी पुणे के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद शिवाजी ने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की। विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। इस समारोह में लगभग रायगढ़ के 5000 लोग इकट्ठा हुए थे। इसी समारोह में शिवाजी को छत्रपति का खिताब दिया गया। उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इस कारण फिर से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ। शिवाजी के परिवार में संस्कृत का ज्ञान अच्छा था और संस्कृत भाषा को बढ़ावा दिया गया था। शिवाजी ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने किलों के नाम संस्कृत में रखे जैसे कि- सिंधुदुर्ग, प्रचंडगढ़, तथा सुवर्णदुर्ग। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। जिसे “शिवराई” कहते थे, और यह सिक्का संस्कृत भाषा में था।

शिवाजी महाराज मात्र 50 वर्ष की आयु में 3 अप्रैल, 1680 स्वर्ग सिधार गए। शिवाजी महाराज एक वीर पुरुष थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन मराठा, हिन्दू साम्राज्य के लिए समर्पित कर दिया। शिवाजी महाराज की जयंती हर वर्ष 15 मार्च को मनाई जाती हैं। सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं पूरे देश में वीर शिवाजी महाराज की जयंती बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाई जाती है।

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