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फ़ेसबुक से बेहतर है भारत का पीठ वाल

Amit Pandey
Amit Pandey
18th Jun, 2020

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अमित कुमार पाण्डेय
आप कुछ भी कहिए पर दुनियाँ में एक से बढ़कर एक आविष्कार हुए और जितनी भी खोजें हुई हैं या जो अभी कोख में हैं, वो भी, कहीं नकहीं अपने हिंदुस्तान में किसी न किसी रूप में पहले से पाये जाते रहें हैं।


राइट बरदर्स तो 1903 में वायुयान उड़ायें थे, पुष्पक विमान में रामजी त्रेता युग में ही बैठ लिए थे। पीटर हेनलें ने 1505 में घड़ी बनाया था, भारत में सूरज देख कर समय जान लेते थे। ज्ञान का गुरू तो शूरू से ही रहा है भारत। डॉक्टर, वैध तो अपने यहाँ घर-घर में पाए जाते हैं।इंटर्नेट से भी तेज यहाँ मन की गति से लोग बैठे-बैठे ही अमेरिका, इंग्लैंड से घूम आते हैं।
फ़ेस्बुक पर चीन-पाकिस्तान को गरियाने से पहले मन ही मन थपड़िया चुके होते हैं, फिर अपनी भावनाओं को फ़ेस्बुक पर आकार देते हैं।


हां वर्षों के बाद एक ऐसा आविष्कार आया जो हर हाथ को काम दिया, बेरोज़गारी से कुछ पल का निजात दिला ख़ुशफ़हमी की दुनियाँ मेंविचराने वाला, फ़ेसबुक की खोज हुई तो दुनियाँ वाले भयानक खुश हुए की इस बार भारत पिछड़ गया। दुनिया भर में ख़ुशियाँ मनाईगयीं, ताबड़तोड़ स्मार्ट फ़ोन बिकने लगे, एक से बढ़कर एक। लेकिन, मार्क जकरबर्ग ने तो 2004 में Facebook लाया, लाकर खूबइतराय, लोगों ने भी हाथों -हाथ लिया। इसके पहले सिर्फ़ कम्प्यूटर, लैप्टॉप की ही बिक्री होती थी, मोबाइल फ़ोन सिर्फ़ ज़रूरी सूचनाओंके आदान-प्रदान के लिए या थोड़ी हालचाल, बात करने के ही काम आता था।महँगा भी बहुत था। ये सब बड़े लोगों के चोचलें थे। स्टेट्ससिंबल थे। पैसा भले ही मार्क ने कमा लिया पर आज भी वो पीठ पीछे चुग़ली करने वालों से निजात नहीं ढूँढ पाया।


हर चीज का बड़ा बाज़ार दुनिया भारत में खोजता है, पीठ पीछे तारीफ़ का जो बाज़ार अपने यहाँ है, वो पूरी दुनिया में कहीं नहीं। अपनीतो साहब संस्कृति ही पूरी तरह इसी पर आधारित है । ईमानदारी की बात कहें तो जिसमें यह गुण नहीं, उससे बड़ा बेवकूफ दूसरा धरतीपर नहीं मिलेगा। मोहल्ले में एक-दूसरे से रिश्ते को प्रगाढ़ता प्रदान करता हैं। विशेषकर, जी है महिलाओं का तो दिन का खाना पचाने काज़बरदस्त चूर्ण का काम करता है। मार्क जकरबर्ग इसी से अपनी कंपनी में ज़्यादातर भारतीयों को रख अच्छे तनख़्वाह दे रहा है महाशयकि कभी तो राज, विद्या का गूढ़ पता चलेगा। जबकि उसी कंपनी में बैठकर लोग वहाँ भी चालू हैं।
सबसे मज़ेदार तब होती है चुग़ली, जबकि मामला कुछ था ही नहीं और बात पुरी शहर और शहर के बाहर भी फैली होती है। हाँ, चुग़ली के कुछ नियम भी है। इसमें पुछना मना होता है कि, ये बात किसने बतायी/बताया। ऐसा करने से आपको टीम के बाहर कर दी जायेगी।दूसरा कि जब आप किसी की चुग़ली कर रहे हों और आपको पता चले की पीठ पीछे आपके बारे में भी यही ख़्याल है तो आपको बूरा नहीं माननी चाहिए। हालाँकि महिलाएँ महज़ इस विद्या की धनी मानी जाती हैं, लेकिन पुरूष भी उनसे कमतर कहीं नहीं।


हमारे यहाँ तो पूरा का पूरा विकास और डाक विभाग ही इसी पर आश्रित है। इसी के कारण तो डाक विभाग को ही लगभग सरकार ने ठपकर दिया। क्यूँकि चुग़ली पहले पहुँचती थी पत्र बाद में। हमारे यहाँ तो अख़बार भी बासी नहीं पढ़ी जाती, वो पोंछने और लपेटने केइस्तेमाल में चली जाती है, तो चुग़ली पत्र बासी कौन पढ़े। ऐसे ही थोड़े न हम लोग विश्व गुरू माने जाते रहें हैं। किसी दिन जब तक मार्कजकरबर्ग पीठ पीछे चल रहे कारनामों को समझ पायेंगे तब तक शायद वो भी पीट चुके होंगे। धन्य हैं हिन्दुस्तान का पीठ वाल, कोई तोड़ नहीं।
कबीर चौराहा
ग्राफ़िक्स फ़ोटो:- साभार

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