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सफर
वैष्णवी रणदिवे
वैष्णवी रणदिवे
22nd Nov, 2022

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हा,एक राह चूनी है मेने
अकेली हू,साथ की उम्मीद है
बारिश के बूंदे,
गीली आँखो के परदे बने है
सडक तो लंबी नजर आयी
मंजिल शायद खूब दूर हैं
कदम रुकते नही
पैर कभी थकते नहीं
परछाई का हाथ थामे
मंजिल की राह देख रही हू
सफर लंबा चलेगा शायद
आगे रुकी में कही
तो फिर मिलुंगी
कुछ किस्से फिर सूनाऊंगी😁
-वैष्णवी✨
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