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उम्र की ढ़लान पर
O.N. Tripathi
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22nd Nov, 2022

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हमारे-
रिश्तों के,
जन्मने की,
खुशी का-
पारामार था,
हमें!
जो, धीरे-धीरे-
घुटनों के बल,
चलते हुए-
न जानें कब?
जवान हो गये,
पता ही नहीं चला।
लेकिन-
यह क्या?
उम्र की ढ़लान पर-
पहुंचे रिश्ते!
अब-
खांसने लगे हैं,
इन्हें-
सांस लेने में,
दिक्कतें-
आने लग रही हैं।
बिना, सहारे के,
न, ये-
खड़ा हो पा रहे,
और,
न, ही,ये-
चल पा रहे।
ऐसे में,
जब,इन्हें-
नितान्त!
हमारी जरुरत है,
तब हम-
मशगुल हैं,
दुसरे-
नये रिश्तों को,सजाने में।
आखिर-
दम तोड़ दे रहे,
हमारे-
अपने ही रिश्ते,
तड़प तड़प-
पीड़ा सिक्त होकर।
क्यों? कभी-
महसुस कर पाते हैं,
हम-
रिश्तों की मर्मांतक पीड़ा?
© ओंकार नाथ त्रिपाठी बशारतपुर गोरखपुर उप्र ।
उम्र की ढ़लान पर

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