Bluepad‘परिवार’ की परिभाषा बदलने की है जरूरत
Bluepad

‘परिवार’ की परिभाषा बदलने की है जरूरत

R
Ramya Deshpande
16th Jun, 2020

Share



कहते हैं परिवर्तन ही संसार का नियम है। यह सही भी है। वर्तमान समय में बढ़ते भागदौड़ की जिंदगी में यह परिवर्तन अधिक दिखाई दे रहा हैं। इसी बदलते समय में भारत के परिवार में भी बदलाव आ गए हैं। आज परिवार की परिभाषा बदल गई। लोगों की सोच बदलने लगी है। पहले जहां भारत में संयुक्त परिवार देखने को मिलते थे वहां आज एकल परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसको लेकर लोगों द्वारा अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं। यह तर्क अशंतः सत्य प्रतीत हो सकते हैं लेकिन इससे समाज में नकारात्मक प्रवृत्ति अधिक बढ़ गई है।

भारत की पहचान उसकी सभ्यता और संस्कृति रही है। भारत की सभ्यता और संस्कृति की तारीफ विदेषों में ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर होती रही है। सच भी है। किसी भी सशक्त देश के निर्माण में परिवार एक आधारभूत संस्था की तरह होती है जिसके कारण देष विकास की सीढ़ी चढता है। परिवार किसी व्यक्ति की प्रथम पाठशाला होती है। व्यक्ति यहीं अपनी जीवन की अच्छी और बुरी आदतों को सीखता है। परिवार से इतर व्यक्ति का अस्तित्व नहीं है इसलिए परिवार को बिना अस्तित्व के कभी सोचा नहीं जा सकता। लोगों से परिवार बनता हैं और परिवार से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व बनता हैं। इसलिए कहा भी जाता है ‘वसुधैव कुटुंबकम’ अर्थात पूरी पृथ्वी हमारा परिवार है। संस्कार, मर्यादा, सम्मान, समर्पण, आदर, अनुशासन आदि किसी भी सुखी-संपन्न एवं खुशहाल परिवार के गुण होते हैं।

परंतु वहीं दूसरी और समय के साथ-साथ परिवार की अवधारणा बदलते जा रही है। अब संयुक्त परिवार एकल परिवार में बदल रहे हैं। पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ने के कारण आधुनिक पीढ़ी का अपने बुजुर्गों व अभिभावकों के प्रति आदर कम होने लगा है। वृद्धावस्था में अधिकतर बीमार रहने वाले माता-पिता अब उन्हें बोझ लगने लगे हैं। वे अपने संस्कारों और मूल्यों से कटकर एकाकी जीवन को ही अपनी असली खुशी व आदर्श मान बैठे हैं। देश में ‘ओल्ड एज होम’ की संख्या बढ़ती जा रही है। बुजुर्ग वर्ग और आधुनिक पीढ़ी के विचार मेल नहीं खा पाते हैं। बुजुर्ग पुराने जमाने के अनुसार जीना पसंद करते हैं तो युवा वर्ग आज की स्टाइलिश लाइफ जीना चाहते हैं। इसी वजह से दोनों के बीच संतुलन की कमी दिखती है, जो परिवार के टूटने का कारण बनती जा रही है। संभवतः यही कारण है कि देश में अपराधों की संख्या  में बढ़ोत्तरी होते जा रही है। बलात्कार, हत्या, लूट, डकैती जैसे मामले बढ़ते जा रहे हैं।

बढ़ते अपराधों ने हमें यह विचार करने पर मजबूर कर दिया है कि हमारी जड़ों को कैसे सुधारा जाए। कैसे हम अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे कि वे एक अच्छे समाज के निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभा सके। तो इसका एकमात्र उत्तर होगा संयुक्त परिवार। यदि संयुक्त परिवारों को समय रहते नहीं बचाया गया तो हमारी आने वाली पीढ़ी ज्ञान संपन्न होने के बाद भी दिशाहीन होकर विकृतियों में फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर देगी। अनुभव का खजाना कहे जाने वाले बुजुर्गों की असली जगह वृद्धाश्राम नहीं बल्कि घर है। वह संयुक्त परिवार जहां बुर्जुग अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे सके। ऐसे संस्कार जिसमें बच्चे अपने बुर्जुगों की उपेक्षा न करें बल्कि उनका सम्मान करें। जहां किसी भी संकंट की घड़ी की  में सभी एकजुट होकर उसका समाधान करने में सहभागी बने। वैसे परिवार जो लोगों के सामने मिशाल प्रस्तुत कर सके। जिस सभ्यता-संस्कृति के लिए भारत आदर्श रहा है उसको पुर्नजीवित कर विश्व पटल पर भारत की छवि को फिर से आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करें।

8 

Share


R
Written by
Ramya Deshpande

Comments

SignIn to post a comment

Recommended blogs for you

Bluepad