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अपना समझा
O.N. Tripathi
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20th Sep, 2022

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मैं-
भागता रहा,
तेरे-
पीछे-पीछे,
इस कदर,
कि-
खुद को ही,
भूल गया।
मुझे-
पता है,
तेरी-
मुस्कान,
घुंघराले-
काले घने बाल,
उन्नत-
कुच द्वय,
काया-
कंचन कलश सम,
खंजन-
नयन युगल कजरारे,
बलखाती-
सर्पिल कटि,
मतवाली-
पायल की रुनझुन,
सांसों की-
मदमस्त सुगंध,
नहीं है-
कुछ भी मेरा,
फिर भी-
रोप दिया मन में,
क्यों-
अपनेपन का पौधा?
टूटकर-
बिखर गया एक दिन,
उस-
दर्पण के मानिंद,
जिसने-
जीवन में अपने,
पत्थर को-
अपना समझा था।
-© ओंकार नाथ त्रिपाठी, बशारतपुर, गोरखपुर उप्र।
अपना समझा

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