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बच्चों और माता-पिता के बीच बदलाव ना आए आड़े !

Simran
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15th Jun, 2020

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बच्चे के जन्म के साथ ही माता-पिता के जीवन में बदलाव आता है। यह बदलाव जारी रहता है। चाहे समय बच्चे के जन्म का हो, स्कूल या फिर काॅलेज का। हमेशा बच्चों के साथ उनके माता-पिता इस बदलाव में साथ होते हैं। आज हम बात करेंगे कैसे बच्चे जब स्कूल से काॅलेज की ओर जाते हैं तो उनके साथ उनके माता-पिता किस बदलाव से गुजरते हैं।

कहा जाता है कि बच्चे की पहली पाठशाला उसका परिवार भी होता है। यह सही भी है। उस परिवार में माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन रहते हैं। इन सभी के व्यवहारों, विचारों का प्रभाव बच्चों पर पड़ता हैं। लेकिन इन सबमें अगर बच्चे पर किसी का अधिक प्रभाव पड़ता है तो वे हैं माता-पिता। यही कारण है कि बच्चे होने के बाद माता-पिता का जीवन बदल जाता है।
बच्चे जैसे हीं  स्कूल, काॅलेज जाना शुरू करते हैं माता-पिता की जिम्मेवारियां बढ़ जाती है। बच्चे के वर्तमान से लेकर भविष्य तक को सही दिशा में चले इसके लिए वे हमेशा प्रयासरत रहते हैं। इन सबमें माता-पिता ही नहीं बच्चे का जीवन भी बदलता रहता है। बच्चा जब स्कूल में रहता है माता-पिता उसे हमेशा सही शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। उन्हें सही गलत की पहचान करवाई जाती है।

माता-पिता की कोशिश रहती है कि वे अपने बच्चों को हर वो चीज मुहैया करवाएं, जो उन्हें हासिल नहीं हुई। चाहे वह अच्छे स्कूल में पढ़ाई हो, या वीडियो गेम्स, आलीशान बर्थडे पार्टी हो या विदेश की सैर। इसके लिए उनकी ओर से मेहनत ओर प्लानिंग में कोई कमी नहीं रहती। वहीं बच्चों पर यह अंधाधुंध प्रतियोगिता, माता-पिता की बढ़ती अपेक्षाएं और अपने आप को साबित करने का दबाव रहता है। इस दवाब का सामना बच्चों को स्कूल के समय से ही करना पड़ता है। जैसे- स्कूल में प्रथम आने का दवाब, शिक्ष के नजर में अपने आप को अच्छे रूप में स्थापित करने का दवाब, सहपाठियों के बीच साकारात्मक छवि पेश करने का दवाब। इन बोझों के तले बच्चा हमेशा दबता चला जाता है। बच्चों की अनचाही जरूरत को पूरा करते रहने और बच्चों के उपर के दवाब के कारण बच्चा कभी-कभी गलत रास्ते को चुन लेता है। किसी पर वेबजह चिल्लाना, जिद्द करना, गलत बातें करना इसी दवाब का परिणाम होता है।
वहीं काॅलेज पहुंचते ही बच्चों की समस्या समाप्त नहीं होती। परिवार का दवाब और काॅलेज में सहपाठियों के बीच धाक जमाने की प्रवृति, शारीरिक बदलाव। यह बदलाव बच्चे के साथ-साथ उसके माता-पिता साथ भी होता है। ये बदलाव या दवाब कभी-कभी दोनों ही पक्षों के मानसिक अवसाद का कारण बन जाता है। आज के दौर में हर तरफ गजब की प्रतियोगिता है। कई माता-पिता अपने बच्चों के माध्यम से अपनी महत्वाकांक्षा पूरा करना चाहते हैं। जिन बच्चों पर जरूरत से ज्यादा अपेक्षाओं का बोझ होता है, वे बहुत जल्द मनोवैज्ञानिक दिक्कतों से घिर जाते हैं। बच्चों में डिप्रेशन अब आम बात हो गई है। आज परिवार में माता-पिता और बच्चों के बीच दूरियां रही ही नहीं। हालांकि माता-पिता बच्चों के दोस्त बनने की कोशिश करते हैं लेकिन यह हमेशा सफल नहीं होता।

बाल मनोचिकित्सकों का कहना है कि स्कूल से काॅलेज तक पहुंचते हुए जैसे बच्चों में परिवर्तन होता है वही परिवर्तन माता-पिता में भी होता है। यही परिवर्तन कभी-कभी अवसाद का कारण भी बन जाती है। इसके लिए आवश्यक है कि, ‘बच्चों को पूरा वक्त देना चाहिए। उस वक्त में हो सकता है आप सब साथ बैठ कर खाना खाएं, टीवी देखें या कुछ पढ़ें।’

बाल मनोचिकित्सकों के अनुसार बच्चों को शुरू से सिखाएं कि ईमानदारी, सच्चाई, धैर्य और अनुशासन का कोई पर्याय नहीं। आप उनके सामने खुद उदाहरण बनें। उनकी प्रशंसा का कोई अवसर ना चूकें। अगर बच्चा गलती करता है, तो उसे अकेले में फटकारें, दूसरे बच्चों के सामने नहीं। उनका आत्मविश्वास बढ़ाएं। उन्हें जीने की कला सिखाएं। जानवरों से प्यार करना सिखाएं, इससे वे संवेदनशील होंगे। बच्चों के दोस्त बनें, लेकिन हमेशा एक हलकी दूरी बनाए रखें। पति-पत्नी अपनी बातें उनसे ना शेयर करें। बच्चों को अपनी बात कहने दें। हमेशा संवाद बनाए रखें।

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