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मैंने अक्सर देखा है.
कपिल रेगे
कपिल रेगे
24th Jun, 2022

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भीड़ को एकजुट होते मैंने अक्सर देखा है
भीड़ को अपना आपा खोते मैंने अक्सर देखा है
भाई को भाई से लड़ते मैंने अक्सर देखा है
दिनों को बर्बाद होते मैंने अक्सर देखा है
बातों बातों में बात बिगड़ते मैंने अक्सर देखा है
इन्सान की इन्सानियत खोते मैंने अक्सर देखा है
रातों रात तक़दीर बदलते मैंने अक्सर देखा है
प्यार में कुर्बान होते मैंने अक्सर देखा है
हर कोई रोजाना यहां कुछ ना कुछ देखता रहता है
अपनी ही आंखों पर से पर्दा सबके उठता है
कवि/शायर-क.दि.रेगे

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