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सफर
Prince kumar Jha
Prince kumar Jha
23rd Jun, 2022

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वो भी क्या दिन थे ये भी क्या दिन है!
मेरी हीं लापरवाही से मेरा वो दिन ढल गया!
ज़िंदगी रेत की तरह
हाथों से फिसल गया!
सबकुछ मेरे हाथ में थे पर मैं
अपने हाथों को मुट्ठी बांधने से था मुकर गया!
तमाशबीन बन
मैं अपनी हीं बर्बादी का था मंजर बुन रहा!
किसी का कहना था एक ना सुना
पास आये मंज़िल को छोड़
मैने एक नए सफर को था चुन लिया
मैने अपने ज़िंदगी के हर फैसले खुद से लिया!
खुद की फसलों पर अटल रहा
अपनी बर्बादी का ये मंजर मैने खुद चुना!
सफर

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