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Bhawna Nagaria
Bhawna Nagaria
29th Nov, 2021

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शब्दों की ताकत को ...हर जन ने स्वीकारा है ,
जाने क्यूं ...पर दिल ने मेरे.... ये कभी नहीं माना है ,
मैंने तो इन शब्दों को .... बेहद दुर्बल जाना है ,
शब्दों की इस माला को... आज भी अधूरी माना है ।

मन की अभिव्यक्ति को पूरा .... कहां ये बयां कर पाते हैं ,
कहते कहते अकसर ... ये शब्द कहीं खो जाते हैं ,
संवेदना में जो आता है ....
अकसर इससे बेहद कम ही कहा जाता है ।

खामोशी की भाषा को , कहां शब्द मिल पाते हैं ,
मन की वेदना पढ़ने में, ये शब्द अकसर ही हार जाते हैं ,
आंसुओ की भाषा को कहना , इन शब्दों को नहीं आता है ,
इनकी नमी में घुलकर बहना, शायद...इन्हें ज्यादा भाता है ।

दिल के जज़्बातों को भी , ये शब्द कहां कह पाते हैं ,
गहराईयों से डरकर.... दिलों की, ये वहीं कहीं छुप जाते हैँ ।

मन के एहसासों को भी... कहां शब्द मिल पाते हैं,
खुद को हारा जानकर ... फिर ये अनकहे ही रह जाते हैं ।

चाहत और लगावों को भी.. कहां ये व्य़क्त कर पाते हैं ,
अपनी ही दहलीज मे बंधें ये शब्द....पार उसे नहीं कर पाते हैं ,
वाणी के बंधन में बंधना ... शायद शब्दों को नहीं भाता है ,
कहते कहते हर इंसान ... इसलिएअकसर चुप हो जाता है ,
शब्दों के हेर फेर मे ....ये शब्द ... निशब्द...हो जाते हैं ,
अनछुए ये शब्द ...घुट घुटकर ...फिर अनकहे ही दफन हो जाते हैँ ।

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