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धुआँ-धुआँ

एकान्त नेगी
एकान्त नेगी
13th Jun, 2020

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साँसों में ये कैसी घुटन
आँखों में है कैसी चुभन
क्या हुआ मेरे शहर को
जिधर देखो बस धुआं-धुआं

कितनी धवल चांदनी रातें
चाँद से करते मन की बातें
कितना भोला था बचपन
आज जवानी है धुआं-धुआं

मानव मानव में है दंगल
उगे हैं कंक्रीट के जंगल
प्यासी धरती सूखे दरख़्त
उठता है बस धुआं-धुआं

जंगल काटे हो गए सयाने
खोल दिए कल कारखाने
जहर ने जकड़ा है हवा को
बचा है तो बस धुआं-धुआं

हर ज़िन्दगी यहाँ है बीमार
खड़ी है प्रदुषण की दीवार
भौतिक सुख की चाहत में
जिंदगी बन गई धुआं-धुआं

कब सुबह कब हुई शाम
सुकून को लगा है विराम
हिमशिखर दर्शन देता नहीं
उसके आँगन में धुआं-धुआं

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एकान्त नेगी
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एकान्त नेगी

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