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किसी को ज़ुकाम है..

डॉ० आर० हक़
डॉ० आर० हक़
13th Jun, 2020

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नई बज़्म-ए-ऐश-ओ-नशात में ये मरज़ सुना है कि आम है
किसी लोमड़ी को मलेरिया किसी मेंठकी को ज़ुकाम है
ये अजीब साक़ी-ए-माह-वश तिरे मय-कदे का निज़ाम है
हुआ जैसे तू भी दिवालिया न तो ख़ुम न मय है न जाम है
यहाँ ज़िक्र-ए-आब-ओ-तआम क्या यहाँ खाना पीना हराम है
यहाँ बर्त रखते हैं रोज़ सब यहाँ रोज़ माह-ए-सियाम है
न तो मुत्तफ़िक़ किसी अम्र में न तो मुत्तहिद किसी काम में
मिरे लीडरों का दिमाग़ है कि हिमाक़तों का गोदाम है
अभी है ग़रीबों की चश्म तर अभी उन के हाल पे इक नज़र
अबे इंक़लाब ठहर ज़रा अभी तुझ से और भी काम है
मैं सुना चुका हूँ हज़ार बार उन्हें दर्द-ओ-यास की दास्ताँ
न यक़ीन हो तो वो पूछ लें कि गवाह टेलीग्राम है
अभी उस को जिस्म तो ढकने दो अभी उस को पेट तो भरने दो
अभी उस को फ़िक्र-ए-अवाम क्या अभी नंगा भूका निज़ाम है
वही ख़ादिमाना रविश रहे ये ख़याल-ए-रहबरी छोड़ दो
इसे पी सकोगे न दोस्त तुम ये बहुत ही गाढ़ा क़वाम है
तुझे अपने और पराए का नहीं कुछ शुऊर अभी तलक
मिरे जाँ-निसारों की लिस्ट में ज़रा देख तेरा भी नाम है
भला 'शौक' उन से दबेंगे क्या भला 'शौक़' उन से डरेंगे क्या
भला 'शौक' दर से उठेंगे क्या ये ख़याल दोस्त का ख़ाम है।।

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