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प्रेम

Anil prajapati
Anil prajapati
13th Jun, 2020

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प्रेम......?
क्यों होता है
चाँद के जैसे
बढ़ता है धीरे-धीरे
एक शीमा तक ,
फिर घटता है
उसी गति से
और, खो जाता है कही
फिर, कोई गाता है गीत बिरह के
अमावस्या की काली रातो में....!
प्रेम .......?
क्यों नही होता अंकुर की तरह
जो, बढ़ता रहे बृक्ष बनने तक
फैला दे अपनी जड़ों को
पाताल तक
और, तमन्ना आसमान छूने की हो
जिसकी शीतल छाया मन हर्षाए
और, गाता रहे गीत मिलन के
खिलते रहे नये शुमन
भर जाए हर मन
प्रेम की खुशबू से सदा के लिए।

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Anil prajapati
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Anil prajapati

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