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Sunita Vishwakarma
Sunita Vishwakarma
12th Jun, 2020

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धर्म / भक्ति निस्वार्थ भाव से करें, भगवान के सामने किसी तरह की शर्त नहीं रखनी चाहिए

राजा ने अपने महल में एक नया सेवक नियुक्त किया, राजा ने उससे पूछा कि तुम्हें कैसे वस्त्र पहनना पसंद हैं? सेवक ने कहा कि मालिक जैसे रखता है, उसे वैसे ही रहना पड़ता है
पुराने समय में राजा के महल में एक नया सेवक आया। राजा ने उससे पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? सेवक ने जवाब दिया कि महाराज जिस नाम से आप बुलाएंगे, वही मेरा नाम होगा। इसके बाद राजा ने पूछा कि तुम क्या खाओगे? सेवक ने कहा कि जो आप खाने को देंगे, वही मैं खा लूंगा। राजा ने अगला सवाल पूछा कि तुम्हें किस तरह के वस्त्र पहनना पसंद हैं?

सेवक ने कहा कि राजन् जैसे वस्त्र आप देंगे, मैं खुशी-खुशी धारण कर लूंगा। राजा ने पूछा कि तुम कौन-कौन से काम करना चाहते हो?

सेवक ने जवाब दिया कि जो काम आप बताएंगे मैं वह कर लूंगा। राजा ने अंतिम प्रश्न पूछा कि तुम्हारी इच्छा क्या है? सेवक ने कहा कि महाराज एक सेवक की कोई इच्छा नहीं होती है। मालिक जैसे रखता है, उसे वैसे ही रहना पड़ता है।

ये जवाब सुनकर राजा बहुत खुश हुआ और उसने सेवक को अपना गुरु बना लिया। राजा ने सेवक से कहा कि आज तुमने मुझे बहुत बड़ी सीख दी है। अगर हम भक्ति करते हैं तो भगवान के सामने किसी तरह की शर्त या इच्छा नहीं रखनी चाहिए। तुमने मुझे समझा दिया कि भगवान के सेवक को कैसा होना चाहिए।

प्रसंग की सीख

इस प्रसंग की सीख यह है कि हमें भक्ति करते समय भगवान के सामने किसी तरह की शर्त नहीं रखनी चाहिए। भक्ति हमेशा निस्वार्थ भाव से ही करना चाहिए।
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