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बचपन का अधिकार, खुशियों का अधिकार...

Surekha Bhosale
Surekha Bhosale
12th Jun, 2020

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कुछ दिन पहले एक पोस्ट मैने कहीं पढ़ी थी। एक फोटो था जिसमें एक टपरी पर चाय परोस ने वाले लड़के की तस्वीर थी और बगल में लिखा था, “आप जिसे छोटू के नाम से पुकारते हैं वो शायद अपने घर का बड़ा हो।“ यह बात सच है। आज ऐसे कई बच्चे हैं जो अपने परिवार का बोझ ढो रहे हैं। अपने माता पिता के रहते उनके साथ या उनके बगैर किसी दूसरे लोगों के साथ वो छोटे बड़े काम करते हैं। जहाँ ज्यादा लोगों की जरूरत होती है लेकिन जो ज्यादा मेहनत के काम नहीं होते ऐसी जगह पर बेजिझक बच्चों को काम के लिए रखा जाता है। इसमें चाय की टपरी, बीड़ी सिगरेट बनाने के कारखाने, बेल्ट, पर्स ऐसी चमड़े की चीजे बनाने के कारखाने या कन्स्ट्रकशन साइट पर १८ साल के नीचे के बच्चों को रखा जाता है। यह काम बड़ों के मुताबिक कम मेहनत के हो सकते हैं लेकिन बच्चों के नन्हें और कमजोर हाथों के लिए वह हद से ज्यादा कष्ट वाले हो सकते हैं। फिर भी उनसे यह काम करवाए जाते हैं।

बच्चों को इस तरह काम पर रखने की दो वजह होती हैं। एक तो इन बच्चों को कम पैसे देकर ज्यादा से ज्यादा काम करवाया जा सकता है। दूसरा यह की उनके रहने, खाने, पीने का बंदोबस्त हो जाए तो इनके माँ बाप उन्हे आसानी से किसी भी काम के लिए भेज देते हैं। दो पैसे ज्यादा आएंगे तो घर के खर्चे में हाथ बटेगा इसी आशा में माँ बाप उन्हे मेहनत मजदूरी के काम पर भेज देते हैं। ज्यादा तर गरीब और आदिवासी लोगों में यह चलन दिखता है।

कई बार इन बच्चों की प्रताड़ना होती है, छोटी छोटी बातों पर उन्हे मारा पिटा जाता है, उनका शारीरिक शोषण किया जाता है। हमारे देश में ऐसी कई सारी घटनाएँ हुई है जहाँ छोटे लड़के लड़कियों को कई दिनों तक भूखा प्यासा रखा जाता है, उसके साथ ही उनसे बहुत काम करवाया जाता है। उसके बाद भी उन्हे वो काम के पैसे नहीं दिये जाते जिसकी वजह से उनके माँ बाप ने उन्हे काम के लिए भेजा था। कुछ स्वयंसेवी संस्थानों के साथ मिलकर पुलिस ने ऐसे कई बच्चों को उनके मालिकों के चंगुल से बचाया है।

हमारे देश में १८ साल की उम्र के छोटे बच्चों को काम पर रखना गैर कानूनी है। यह पता होने के बावजूद कुछ पढे लिखे गंवार बच्चों का शोषण करते रहते हैं। कुछ लोग तो “हम बच्चों को पढ़ाएंगे” ऐसा कह कर उन्हे अपने घर लाते हैं और उनसे गधों की तरह मेहनत करवाते हैं। यह सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। अफ्रीका में बच्चों को गुलाम बनाकर उनसे मेहनत का काम करवाने का सिलसिला अब भी बरकरार है। इस सब पर रोक लगाने के लिए १२ जून २००२ को इंटरनॅशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन ने १८२ वी परिषद में १९९९ से विचारधीन रहे बाल मजदूरी विरोधी प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इस दिन से पूरी दुनिया में हर साल १२ जून यह दिन बाल मजदूरी विरोधी दिन के तौर पर मनाया जाता है। इसके तहत बच्चों से मजदूरी न करवाने के लिए कई सारे कार्यक्रम किए जाते हैं, इसके बावजूद यह अमानवीय तरीका अब भी जारी है।

पूरी दुनिया में इस वक़्त कम से कम १५ करोड़ २० लाख बाल मजदूर हैं। इसमे से करीब ५० लाख बाल मजदूर भारत में हैं। केन्द्रीय श्रम और रोजगार विभाग के मुताबिक महाराष्ट्र में यह आंकड़ा २ लाख ६० हजार इतना है। देश के कुल बाल मजदूरों में से ५.२३ प्रतिशत महाराष्ट्र में और ३५.६२ प्रतिशत उत्तर प्रदेश में बाल मजदूर हैं जो की देश की सब से बड़ी संख्या है।
खेलने कूदने, पढ़ाई कर कल के ख्वाबों में खो जाने की उम्र में यह बच्चे अपने कंधों पर अपने परिवार का असहनीय बोझ ढो रहे हैं। उनके लिए कानून है। उनके बारे में हम जानते हैं फिर भी कहीं अगर कोई बच्चा काम करता दिखाई दे तो मानवता के हेतु उसकी पूछताछ करने के अलावा हम कुछ नहीं करते। लेकिन अब सिर्फ इतना करना काफी नहीं होगा। अब आपको उसके बारे में पुलिस में इत्तला देनी होगी। जो लोग बच्चों को काम पर रखते है वो लोगों को यह कहकर डराते हैं कि, “अगर पुलिस को उन मजदूर बच्चों के बारे में पता चल जाए तो वो बच्चों को वहाँ से तो निकाल लेगी लेकिन उन्हे बाल सुधार गृह में भेज दिया जाएगा, जहाँ गुनहगार बच्चों को रखा जाता है।” लेकिन यह बात गलत है। दरअसल पुलिस ऐसे बच्चों को चाइल्ड वेलफेअर कमिटी की मध्यस्थता से उनके घर भेजने का प्रबंध करती हैं।

ऐसे बच्चों के पढ़ाई का प्रबंध वहाँ का स्थानिक प्रशासन करता है। हाँ, अब उसमें भी लोग ज्यादा उत्सुक नहीं है लेकिन कानून है और अगर उसका सही तरीके से पालन किया जाए तो बच्चों को काम में झोंक देने की किसी की हिम्मत नहीं होगी। आइए... हम सब मिलकर इस बाल मजदूरी को जड़ से मिटाने के लिए कटिबद्ध हो जाएँ। और आज के इस बाल मजदूर विरोधी दिन में यह संकल्प करें कि काम करते वक़्त अगर कोई बच्चा दिखे तो उसे उसका बचपन फिरसे लौटा देंगे। उसके मासूम बचपन से खुशियाँ पाने का उसे पूरा अधिकार है।

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