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सयानी उम्र और बंदिशों के दायरे में

 मंजू ओमर
मंजू ओमर
10th Jun, 2020

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किशोर मन चंचल होता है इसे वश में करना उफनती हुई नदी को नियंत्रण में करने जैसा है । किशोरावस्था में हुऐ शारिरिक परिवर्तनों के कारण वे दुविधा में पड़ जाते हैं।घर वाले भी उन्हें बार बार कहते हैं कि तुम अब बच्चे नहीं रहे बडे हों गये हो बचपना छोड़ो बच्चों वाला व्यवहार अब छोड़ो ।इस अवस्था में मानसिक और शारीरिक न उलक्षनो में फंसे होने के कारण उन्हें समझ नहीं आता कि वो किस प्रकार का व्यवहार करें । इस दिशा में उन्हें उचित मार्ग दर्शन की जरूरत होती है । ओर यह काम माता-पिता ही उचित ढंग से कर सकते हैं । मां-बाप को चाहिए कि रिश्तों के दायरे में रहकर अच्छे बुरे का फर्क बताये ।इस उम्र में उनकी सोच बदलने लगती है ।वैसे सपऩोकी दुनिया में विचरण करने लगते हैं ।इस आयु में विपरीत लिंग में आकर्षण बढ़ जाता है । उनकेे मन आपस में बात करने की इच्छा जागृत होने लगती है ।और एक दूसरे से दोस्ती करने की इच्छा जागृत होने लगती है ।घर वालों के डर से वे छिप छिपकर मिलने जुलने लगते हैं ।और ऐसे में कभी कभी भयानक गलती कर बैठते हैं । जिससे जीवन भर पछताना पड़ता है । बेहतर है कि लड़की और लड़के के दोस्तों को घर बुलायेंगे सब लोग साथ मिलजुल कर बात करें बहुत अधिक रोक-टोक नहीं करें । स्वस्थ माहौल मिलने पर उनको अपनी इच्छाओं को दबाने की जरूरत नहीं पड़ेगी ।और वे अपनी हर बात शेयर करेंगे हर समय उन्हें डाटिये मत कुछ बातें प्यार से भी समक्षाये ।
भावनात्मक रिश्तों में बंधा समतल सपाट राह पर चलने वाला जिसका धुव है व्यक्ति। व्यक्ति के आपसी संबंध ही परिवार का निर्माण करती है । परिवार में दरार पैदा होती है जब हम अपने विचार एक दूसरे पर थोपने लगते हैं । माहौल तब और भी गंभीर हो जाता है जब तनाव मां बाप और संतान के बीच में हो । माता-पिता विभिन्न मामलों में संतान को सलाह देते हैं और चाहते हैं कि वे हमारी बात मानें । अधिकतर तकरार पढ़ाई जाब और शादी को लेकर होती है । इस तकरार से बचा नहीं जा सकता । आज हर क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं उन्हें थोड़ी स्वतन्त्रता दे । बच्चों में उत्साह की भावना जगने दे । उनमें छिपे हुनर को बाहर आने दे । किशोरावस्था में आने पर बच्चे किसी तरह का अंकुश पसंद नहीं करते उन्हें थोड़ा अपने मन का भी करने दे । लेकिन उन पर अंकुश लगाना भी जरूरी है । ऐसे समय में उनपर इस तरीके से नियंत्रण लगाये कि उन्हें पता भी न चले । शुरू से ही उन्हें सही और ग़लत से अवगत कराते रहे । अपने बच्चों को मित्र बनाने लें और उनसे हर बात शेयर करें जिससे वो आपको हर बात का भागीदार बनाये । बच्चों की समस्याओं को ध्यान से सुने और उन्हें सुलक्षाने का प्रयत्न करें । साथ ही साथ ये भी अत्यंत आवश्यक है कि अपने घर का वातावरण आनंद दायक और प्रसन्न चित्त रखें ताकि बच्चे घर में रहना पसंद करे । युवा पीढ़ी अपनी अलग पहचान बनाने के चक्कर में ग़लत रास्ते अपना लेती है । अपनी बात मनवाने की ज़िद रिश्तों को तो जर्जर करतीं ही हैं टकराव के नाते मुद्दे भी पैदा करती है । बच्चे देश के भावी नागरिक हैं इन्हीं के कंधों पर देश का भविष्य निर्भर है । इन्हें स्वस्थ माहौल दिया जायेगा ताकि उनके विचार और सोचने का तरीका दोष पूर्ण न हो । इससे उनका और देश का भविष्य उज्जवल होगा ।

मंजु
ओमर
क्षांसी

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