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बारिश

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Supriya Hadkar
9th Jun, 2020

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बारिश!

अब की बारिश
पहले की तरह
भाँती नही।

हाँ कुछ सुकून जरूर मिलता है
गर्मी की जलन से
जमीन की ठंडक से
गीली हवा से।

लेकिन जो खुशी
बचपन की बारिश देती थी
वो अबकी बारिश
देती नही।

रेनकोट में छिपा हुआँ बस्ता लेकर
बारिश के जूते पहनकर
हम स्कूल जाया करते थे।

माँ स्कूल से लेने आती थी,
एक हाथ से छाता सम्भालती,
साड़ी का पल्लू बाँध लेती,
दूसरे हाथ से हमें सम्भालती
हम छप छपाक करते
गन्दे पानी मे छलाँग लगाते
स्कूल से वापस आते थे।

वो गरमागरम खाना खिलाती थी,
फिर हम सर्द दोपहर में
टपकती छत के नीचे
बर्तन लगाकर
माँ की सिलाई, दुलाई में दुबककर
सो जाया करते थे।

गीली किताबें,
गिले बाल,
और गीले कपड़े
सुखाने का मजा
तब कुछ और ही था।

मुझे अब भी याद है
कॉलेज जाने के बाद
जिस बारिश से मुंबई में बाढ़ आई थी
उसी बारिश में
मैं अपनी सहेलियों के साथ
पानी भरे रास्तो से
बेफिक्र होकर
हँसती खिलखिलाती हुई,
घर वापस आयी थी।

फिर मैं बड़ी हुई,
समझदार हुई
तो शायद बारिश बिगड़ैल बन गयी।

एक साल की बरसात में
वो मेरे घर मे घुस आयी
मेरी बहुत सारी चीजों के साथ
मेरा बारिश-प्रेम लेकर चली गयी
एक ख़ालीपन सा बदले में दे गई।

पिछले साल की बारिश
मेरी वही साड़ी सम्भालती,
गर्म खाना खिलाने वाली,
अपने हाथों से गर्म दुलाई सिलाने वाली,
मासूम सी, मोम सी,
माँ लेकर चली गयी।

यही कारण है
के अब की बारिश
पहले की तरह
भाँती नही।

सुप्रिया हडकर - मिश्रा
०३/०६/२०२०


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Written by
Supriya Hadkar

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