Bluepadज्योतीरादित्य सिंदिया के भाजपा प्रवेश से इतिहास दोहराया गया
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ज्योतीरादित्य सिंदिया के भाजपा प्रवेश से इतिहास दोहराया गया

Amrut bhosale
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29th Nov, 2021

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९ मार्च २०२० को जब पूरा देश होलिका दहन कर रहा था तब मध्य प्रदेश में एक ज्वालामुखी जनम ले रहा था। और दूसरे ही दिन जब लोग रंगोत्सव मना रहे थे तब यह ज्वालामुखी फुट गया और उसने मध्य प्रदेश की राजनीति को आग के हवाले कर दिया। यह ज्वालामुखी और कोई नहीं बल्कि जिस खानदान ने भारत के राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है उस खानदान के महाराज ज्योतीरादित्य सिंधिया है। १८ साल तक कॉंग्रेस में रहकर विभिन्न पदों का कामकाज संभालने के बाद १० मार्च २०२० को ज्योतीरादित्य ने कॉंग्रेस से नाता तोड़ा और भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किया।
उन्होंने काँग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को अपना इस्तीफ सौंपा है जिसमें उन्होने अपने दिल की बात भी लिखी है। उन्होने लिखा है कि 'मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहा हूं और जैसा कि आपको अच्छी तरह पता है कि पिछले एक साल से मैंने यह मार्ग प्रशस्त किया गया है। आज भी मैं अपने राज्य और देश के लोगों की रक्षा करने के अपने लक्ष्य और उद्देश्य पर कायम हूँ। विधानसभा चुनावों के दौरान ही मेरे मन में कुछ बाते चल रही थी। पिछले १८ साल के सहवास के बाद अब आगे बढ़ने की बारी आई है। अब मैं एक नई शुरुआत करना चाहता हूँ।“
२०१९ की लोकसभा चुनाव की शुरुआत से ही हम हर पार्टी में आने और जाने वाले नेताओं को देख रहे है। अपने पड़ोसी के घर जाने जितनी सहजता से इन लोगों ने पार्टियां बदली हैं। पूरे देश के राज्यस्तरीय नेताओं के अपनी पार्टी छोड़ जाने से उस पार्टी में बहुत बड़ी दरार पड़ गई है। जनता भी इस सब से परेशान है। क्योंकि कल तक पार्टी के नाम पर जिनका समर्थन किया या विरोध किया आज उन्ही के लिए बिलकुल उल्टी प्रतिक्रीया देनी पड़ रही हैं। नेताओं को भी आपने घरभेदी रवैये से नुकसान उठाना पड़ रहा है; फिर वो पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता हो या कल परसों आए पराएँ हो। किसी निष्ठावान को पार्टी ने ही नकार दिया तो किसी को जनता ने। देश की राजनीति ऐसी कठिन परिस्थिती से गुजरते वक़्त कुछ पुराने लोगों ने अपना हौसला बनाएँ रखा। अपनी अपनी पार्टी को मजबूत करने की वो पुरजोर कोशिश करते रहे। दूसरी पार्टी से आकर अपने सिर पर बैठे लोग और पार्टी हाय कमांड दोनों की मर्जी संभालते रहे। लेकिन घर को संभालनेवाला कोई भी जिगरबाज़ मुखिया न होने की सूरत में काँग्रेस की अवस्था किसी खंडहर जैसी हो गई थी। और अब आज उसका एक गढ़ धराशायी हो गया है। सिंधिया घराने का ५२ साल पहले का इतिहास आज दोहराया गया।
कॉंग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच लगी प्रतिस्पर्धा नयी नहीं है। मध्य प्रदेशा के सिंधिया खानदान ने कभी हाथ का साथ दिया तो कभी कमल को अपनाया है। इसकी शुरुआत महाराजा जिवाजीराव की पत्नी राजमाता विजयाराजे सिंधिया से शुरू हुई थी। उन्होने १९५७ में काँग्रेस के टिकट पर गुणा जिले से और १९६२ में ग्वाल्हेर से चुनाव लड़ा और वो लोकसभा पहुंची। उस वक़्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे डी. पी. मिश्रा। विजयाराजे ने आगे आनेवाली लोकसभा चुनावों के लिए कुछ लोगों की सिफ़ारिश की और उनकी एक सूची मुख्यमंत्री के पास ले गई। लेकिन मुख्यमंत्री ने उनको नजरंदाज कर दिया। इसी तरह का बर्ताव बार बार होने लगा जिससे राजमाता खफ़ा हो गई। और उन्होने ३६ विधायकों के साथ काँग्रेस को अलविदा कहा जिससे मध्य प्रदेश कॉंग्रेस में भूचाल आ गया था। उसके बाद उन्होने सी. राजगोपालाचारी के स्वतंत्र पार्टी में प्रवेश किया और उनके टिकट पर गुणा से लोकसभा में पहुंची। १९६७ में उन्होने वो पार्टी भी छोड़ी और उस वक़्त के जनसंघ में प्रवेश किया। उन्होने राज्य के राजनीति में ज्यादा ध्यान देने के लिए लोकसभा सदस्यता का इस्तीफा दिया और वो करेरा चुनाव क्षेत्र से विधानसभा पर गई और इसी तरहा उन्होने राज्य के राजनीति में कदम रखा। उसके बाद उनके पुत्र माधवराव भी इस राजनीति में आ गए। १९७१ में जब पूरे देश में इंदिरा लहर उठ रही थी उस वक़्त जनसंघ को मध्य प्रदेश में ३ सीट्स पर जीत मिली और वो थी भिंड से राजमाता विजयाराजे सिंधिया, ग्वाल्हेर से अटल बिहारी वाजपेयी और गुणा से माधवराव सिंधिया।
लेकिन यही वो समय था जब राजनीति ने अपनी करवट बदली। माधवराव की संजय गांधी के साथ दोस्ती हो गई और उन्होने राजमाता से झगड़ा मोल लेकर कॉंग्रेस में प्रवेश किया। राजमाता की दो बेटियाँ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के नाम में तब्दील हुई पार्टी में काम कर रही थी, जो की आज भी वहीं पर है। संजय गांधी के मृत्यु पश्चात माधवराव की दोस्ती राजीव गांधी के साथ हुई और यह दोस्ती का सिलसिला आज भी ज्योतीरादित्य की प्रियंका और राहुल गांधी के दोस्ती के साथ जारी है।
काँग्रेस में आने के बाद माधवराव सिंधिया ने विभिन्न पदों पर कामकाज संभाला लेकिन उन्हे कभी भी मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला। १९८९ में मोतीलाल वोरा और १९९३ में दिग्विजय सिंग से उन्हे शिकस्त का सामना करना पड़ा। लेकिन हसमुख और सौम्य स्वभाव के माधवराव ने कभी पार्टी से विद्रोह नहीं किया। लेकिन ज्योतीरादित्य वैसे नहीं हैं। उन्होने जब मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की तब उन्हे उनके पिता की ही तरह नजरंदाज कर दिया गया। दिग्विजय सिंग की कृपा से कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन उसके बाद ज्योतीरादित्य हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहे। वो जनता के कामों में लापरवाही बरतने वाले कमलनाथ सरकार पर निशाना साधते रहे।
६ जून २०१७ को मंदसौर में किसानों के आंदोलन ने उग्र स्वरूप धरण कर लिया था। उस वक़्त मुख्यमंत्री भाजपाचे शिवराज सिंग चौहान थे। विरोधी पार्टियों और मुख्य रूप से काँग्रेस ने मुख्यमंत्री पर आंदोलन को भड़काने का आरोप लगाया। लेकिन जब २०१८ में वो सत्ता में आए तब कॉंग्रेस के नेता पलट गए। इसके लिए ज्योतीरादित्य ने हमेशा कमलनाथ सरकार को लतेड़ा। “पार्टी के घोषणा पत्र में कही गई बाते अगर सरकार पूरी नहीं कर सके तो हम रास्ते पर उतर आएंगे” ऐसी धमकी ज्योतीरादित्य ने दी। उसके जवाब में कमलनाथ ने कहा, “ठीक है, उतार आइए।“ इसके बाद काँग्रेस के अंदर के झगड़े चौराहे पर आ गए। २१ जानेवारी २०१९ के दिन शिवराज सिंग और ज्योतीरादित्य की मीटिंग हुई और तब से इस ज्वालामुखी की गरमाहट महसूस होने लगी थी। और चुनाव के वक़्त एक दूसरे को नीचा दिखाने वाले ज्योतीरादित्य और शिवराज सिंग एक हो गए। ११ मार्च २०२० को उन्होने २२ विधायकों के साथ आधिकारिक रूप से भाजपा में प्रवेश कर लिया। अब २३० विधायकों की विधानसभा में ज्योतीरादित्य के विद्रोह से बहुत बड़ी दरार पड़ी है। १६ मार्च २०२० को होने वाली कमलनाथ सरकार की फ्लोर टेस्ट अब २६ मार्च २०२० तक टल गई है। लेकिन अब ज्योतीरादित्य सिंधिया का कॅबिनेट मंत्री पद का रास्ता साफ हो गया है।

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